{"_id":"1080a614-5a6c-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"thoughts-are-frozen-from-the-cold","type":"story","status":"publish","title_hn":"ठंड से विचार भी जम जाते हैं","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
ठंड से विचार भी जम जाते हैं
सुधीर विद्यार्थी
Updated Wed, 09 Jan 2013 08:21 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साधो, मैं शीत लहर से ठिठुर रहा हूं। ऐसे में कलम है कि उठती ही नहीं। गालिब भी होते, तो दो पैग के बिना नहीं लिख पाते। हाथ कंपायमान हो जाता। शेर बनते-बनते बिगड़ जाते। वैसे भी दिल्ली में गैंगरेप के बाद कुछ लिखना और बोलना बेहद कठिन हो गया है। ठिठुरन में मुकदमे की सुनवाई भी बंद कमरे में हो रही है। कमजोर लोगों ने घरों से निकलना बंद कर दिया है। फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले भी कंपकंपी के मारे इन दिनों वर्णमाला की 'ए' और 'बी' भूलकर 'सी-सी’ का उच्चारण करने लगे हैं।
विज्ञापन
एक बंदा दूसरे से पूछता है, कहो, कैसी कट रही है?
कटना मुश्किल है, दूसरा दांत किटकिटाकर उत्तर देता है।
मैं पिछले साल नहाया था। गैस पर पानी गर्म करना महंगा हो गया है, तीसरा मुंह से भाप निकालते हुए दखलंदाजी करता है।
ठंड में विचार भी जम जाते हैं। चौथे ने उवाच किया, मार्क्सवाद में अब वह गर्माहट नहीं रही, जो पहले थी। इससे भला तो राज ठाकरे है, जो इतना हॉट बोलता है कि पूरबियों को पसीना आ जाता है।’
विज्ञापन
इसका मतलब तो यह हुआ कि उस मराठी मानुष को ठंड नहीं लगती, पहले ने झुरझुराते हुए टिप्पणी की।
केंद्र में सियासी पारा अभी ठहरा हुआ है, जबकि तमिलनाडु में वह स्टालिन के मार्फत ऊपर जाने लगा है, दूसरे ने पहलू बदला।
तब, करुणानिधि का उत्तराधिकारी कौन बनेगा, तीसरे ने सवाल दागा। चौथे ने दांत किटकिटाते हुए कहा, यह ज्योतिष का प्रश्न है। सियासत के सवाल घर-परिवारों की मिल्कियत की तरह तय नहीं होते।
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश में लोग ठंड से मर रहे हैं। सूरज कोहरे की चादर तानकर लंबायमान हो गए हैं। यहां का सियासी पारा कब चढ़ेगा, पांचवें ने पहलू बदला।
अभी तो एनडी तिवारी ही गर्माहट बढ़ा रहे हैं। काम आता है टूटा पैमाना भी, पहले ने जमी हुई कुल्फी फेंकी।
इस सूबे में तो अलाव भी राजनीति ही जलाती है और लपट तेज होने पर अपनी रोटियां सेंकती है, दूसरा कुलबुलाया।
तीसरे ने जम्हाई लेते हुए कहा, सपाई एनडी के टूटे हुए पैमाने को काम में लाने की जुगत में हैं, पर घुनी हुई लकड़ी आग कम धुआं ज्यादा देती है। देखिए, ऊंट किस करवट बैठता है।
अभी सर्द हवाओं में जनता के टूटे हुए दांत किटकिटायमान हो रहे हैं। जिनके दांत नहीं है, वे मसूड़े बजा रहे हैं और सत्ता में बैठे लोग गाल बजाने का काम बखूबी अंजाम दे रहे हैं।