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वे बच्चे बचाए जा सकते थे

Thu, 01 Dec 2016 07:14 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Thu, 01 Dec 2016 07:14 PM IST
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Those children could be saved
पत्रलेखा चटर्जी

यह किसी घोटाले से कम नहीं। यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2015 में दक्षिण एशिया में अपने जन्म के महज 28 दिनों के भीतर जो दस लाख बच्चे मृत हो गए, उनमें से सात लाख बच्चे अकेले भारत के थे। केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान की स्थिति ही भारत से बदतर है। दुनिया भर में होने वाली नवजात बच्चों की मौतों में से एक चौथाई या 25 फीसदी मौतें भारत में होती हैं। इससे कहीं अधिक चिंता की बात यह है कि ऐसा सिर्फ पिछले वर्ष ही नहीं हुआ, बल्कि बरसों से यही स्थिति बनी हुई है। दुखद यह है कि इन मौतों को रोका जा सकता था।

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विगत दो दशक से जिस देश ने उल्लेखनीय आर्थिक विकास दर्ज किया है और जो एक महाशक्ति बनने की चाह रखता है, वह नवजात बच्चों की इन मौतों को रोकने में क्यों नाकाम रहा? ऐसा नहीं है कि इसके लिए प्रयास नहीं किए गए, असल में ये पूरी तरह से नाकाफी साबित हुए हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। संक्षेप में कहें तो, न तो भारत के राजनीतिक वर्ग और न ही नीतियों को प्रभावित करने वाले लोगों की प्राथमिकता में स्वास्थ्य सेवा है। इसीलिए भारत में बड़ी संख्या में महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के समय पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाती। इसका सर्वाधिक खामियाजा गरीब परिवारों या गरीब राज्यों के परिवारों को भुगतना पड़ता है।
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भारत में शायद ही कभी अमेरिका या ब्रिटेन की तरह स्वास्थ्य सुरक्षा चुनावी मुद्दा बन पाती है। यह विडंबना ही है कि लाखों भारतीय इलाज पर होने खर्च के कारण कर्ज तक में डूब जाते हैं, इसके बावजूद आमजन राजनीतिज्ञों और सरकारों पर स्वास्थ्यसुरक्षा को अपनी पहुंच में और सस्ता बनाने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं बना पाते।
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वर्तमान स्थिति को ही देखिए। पांच सौ और हजार रुपये के नोटों को अमान्य घोषित किए जाने से उपजे माहौल के कारण जब मोदी सरकार पर लोगों का दबाव बना, तो उसने कुछ ऐसे कदम उठाए, जिससे शादी को भी आकस्मिक बना दिया है। जिन परिवारों में शादियां हैं, उन्हें ढाई लाख रुपये की निकासी की छूट मिली है। मगर उन परिवारों की कल्पना कीजिए, जहां यह आकस्मिक या आपात स्थिति शादी के कारण नहीं, बल्कि किसी बीमारी के कारण है। ऐसे लोग दिसंबर तक पांच सौ और हजार रुपये के नोटों का उपयोग कर सकते हैं, बशर्ते कि वे सरकारी अस्पतालों में जाएं। यह छूट निजी अस्पतालों में इलाज करवाने वालों के लिए नहीं है। यदि आसपास कोई सरकारी अस्पताल न हो या फिर सरकारी अस्पताल में बहुत भीड़ हो तो? तब क्या होगा, जब ऐसे परिवारों के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड न हो?

पुणे के एक अस्पताल में एक नवजात बच्ची की मौत हो गई, क्योंकि कथित तौर पर एक प्रमुख अस्पताल ने अमान्य किए गए नोटों से भुगतान लेने से मना कर दिया था, जिससे उसे इलाज में देरी हुई और वह चल बसी। ऐसा ही बुलंदशहर में हुआ, जहां एक अस्पताल में एक बच्चे की मौत हो गई, क्योंकि उसके माता-पिता के पास पुराने नोट थे। हालांकि सरकार के समर्थकों ने ऐसे आरोपों को दुष्प्रचार करार दिया है।


हम सब काले धन को लेकर परेशान हैं। काले धन को खत्म करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम को लेकर भी हम सब उत्तेजित हैं। मगर यह क्यों मुद्दा नहीं बनता कि कई लोगों की मौत इसलिए हो गई, क्योंकि उनके परिजन इलाज के बिलों का भुगतान नहीं कर सके?

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