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भारत के लिए इसलिए अहम है भूटान

Sun, 18 Aug 2019 06:25 PM IST
Raman Singh महेंद्र वेद
महेंद्र वेद Published by: Raman Singh Updated Sun, 18 Aug 2019 06:25 PM IST
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This is why Bhutan is important for India
भूटान में मोदी - फोटो : a

पिछले सप्ताहांत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूटान की अपनी दो दिवसीय यात्रा के  दौरान इस छोटे- से हिमालयी देश के साथ नए सिरे से बिजली खरीदने संबंधी समझौते के साथ डिजिटल दुनिया और वैश्विक कनेक्टिविटी का वादा किया, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। भारत और भूटान के बीच कुल 10 सहमति पत्रों पर दस्तखत किए गए। भारत ने भूटान के साथ अपने संबंध को जल-विद्युत से आगे ले जाने के लिए रसोई गैस से लेकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तक कई क्षेत्रों में परियोजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की। स्वच्छ ईंधन की आपूर्ति में वृद्धि, रूपे कार्ड का शुभारंभ, विदेशी मुद्रा विनिमय की व्यवस्था और विज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना प्रमुख सहायताओं में से था, जिनका उद्देश्य संबंधों के दायरे को व्यापक बनाना था।


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भूटान के लिए ईंधन बेहद महत्वपूर्ण है। भारत ने आम नागरिकों की जरूरतें पूरी करने के लिए रसोई गैस की आपूर्ति 700 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 1000 मीट्रिक टन प्रति महीने करने का वादा किया है। हमारे प्रधानमंत्री ने भूटान को संचार, सार्वजनिक प्रसारण और आपदा प्रबंधन के लिए दक्षिण एशियाई उपग्रह का उपयोग करने की अनुमति देने के लिए भारत की अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा निर्मित सात करोड़ रुपये के ग्राउंड स्टेशन का भी उद्घाटन किया। उन्होंने भूटान के लोगों को आश्वस्त किया कि भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भूटान के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। दोनों देश छोटे उपग्रह बनाने और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के लिए सहयोग करेंगे। उन्होंने भूटानी छात्रों और शोधकर्ताओं को भारतीय विश्वविद्यालयों से जोड़ने की भी घोषणा की।

अधिक वित्तीय सहयोग के मामले में मोदी ने कहा कि भारत सार्क मुद्रा विनिमय फ्रेमवर्क के तहत भूटान के लिए मुद्रा विनिमय सीमा बढ़ाने के  प्रति सकारात्मक है।' भूटान की विदेशी मुद्रा की अंतरिम जरूरत पूरी करने के लिए 10 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराई जाएगी।' उन्होंने आगे कहा कि पंचवर्षीय योजना के तहत भूटान को दी जाने वाली सहायता जारी रहेगी, और पंचवर्षीय योजनाओं के लिए 'फोकस और प्राथमिकताएं' भूटानी लोगों की 'इच्छा' द्वारा निर्धारित की जाएंगी। यह कहते हुए, कि भूटान को मित्र बनाना एक 'विशेषाधिकार' है, मोदी ने कहा कि कौन भूटान को मित्र बनाना नहीं चाहेगा!

उल्लेखनीय है कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभाली थी,  तब पड़ोसी पहले की नीति के तहत उन्होंने सबसे पहले भूटान की यात्रा की थी। इस वर्ष फिर से सत्ता संभालने के बाद उनके नए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत भूटान से ही की थी। दोनों देर से ही सही, पर कुशलता के साथ चीन से निपटने के लिए भूटान से बेहतर रिश्ता बनाने की कोशिश में जुटे हैं। इस छोटे हिमालयी देश को लुभाने के मामले में भारत उस चीन के साथ होड़ में है, जिसने भारी आर्थिक मदद के जरिये दक्षिण एशिया और उससे भी आगे के देशों को अपने पाले में खड़ा कर लिया है।

अपनी सकल घरेलू प्रसन्नता (जीडीएच) को गति देने के भूटान के अभियान को अब खासकर युवाओं से चुनौती मिल रही है, जो आधुनिकता और भौतिक सुख की खोज करना चाहते हैं। वे भारत की प्रबल मौजूदगी को अपनी आकांक्षाओं में बाधक पाते हैं। इसके विपरीत चीन की पहल उन्हें इतनी आकर्षक लगती है कि उसकी अवहेलना करना  कठिन लगता है। चीन के साथ कूटनीतिक संबंधों के लिए भूटान में दिलचस्पी बढ़ रही है। अब यह विषय सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है और सरकार पर चीन के साथ आर्थिक संबंध स्थापित करने के लिए निजी क्षेत्रों का दबाव बढ़ गया है। भूटान इस क्षेत्र में बढ़ते चीनी संबंधों से भी लाभ उठाना चाहेगा।

नई दिल्ली की दुविधा यह है कि भूटान उसके साथ मजबूत सुरक्षा संबंध बनाए रखना चाहता है, तो चीन से बेहतर रिश्ते स्थापित करना चाहता है। दो साल पहले जब चीनी सैनिकों ने दोकलम पठार पर सड़क निर्माण शुरू किया था, तब भारत भूटान की रक्षा करने के लिए आगे आया था। इस कारण चीन के साथ भारत के संबंध तब तक बाधित रहे, जब तक कि मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ वुहान में नहीं मिले। भारत की अनदेखी करते और उसके साथ होड़ करते हुए चीन लगातार भूटान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है-हालांकि दोनों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं, फिर भी वह भूटान को आर्थिक मदद का प्रस्ताव देता है। पिछले एक दशक से भूटान में चीनी उत्पादों और पर्यटकों की संख्या काफी बढ़ गई है। भूटान के साथ भारत के संबंध हमेशा से अच्छे रहे हैं, लेकिन जो पुरानी पीढ़ी भारत की ओर कृतज्ञता से देख रही थी, वह खत्म हो रही है। युवा पीढ़ी विकल्प के रूप में चीन को देख रही है। मौजूदा भूटान सरकार बढ़ती बेरोजगारी और भारत के विदेशी ऋण को लेकर भारी चुनौतियों का सामना कर रही है।

भूटान भारत के सहयोग और निवेश से बिजली पैदा करता है और उसे भारत को बेचता है, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद का 14 फीसदी है। लेकिन अब वहां इस बात की चर्चा है कि यह शर्त भारत के पक्ष में है। पिछले शनिवार को जिस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं, वह इस शिकायत को शांत कर पाएगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। स्पष्ट कहें, तो भूटान भविष्य में नेपाल के रास्ते पर जा सकता है और बीजिंग तथा नई दिल्ली से समान दूरी बनाए रख सकता है। यदि इनमें से कोई चीन के प्रति अपनी ज्यादा निष्ठा दिखाकर भारत को परेशान करेगा, तो भारत जमीनी सीमा से घिरे अपने इन पड़ोसियों की आपूर्ति को अतीत की तरह फिर बाधित कर सकता है। पर हर गुजरते दिन के साथ यह धारणा मजबूत हो रही है कि नई भू-राजनीतिक स्थितियों में भारत अब ऐसा नहीं कर सकता।  उसे अपने छोटे पड़ोसी देशों की आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है, जिसने विकल्प के रूप में चीन को ढूंढ लिया है।

पिछला रिकॉर्ड बताता है कि सहमति पत्र को लागू करने के मामले में भारत का अनुभव मिला-जुला रहा है। उम्मीद की जाती है कि चीन (जो निवेश और अपनी प्रतिबद्धताओं को लागू करने में हमसे आगे है) से आगे निकलने की सोच के तहत सहमति पत्रों को जमीनी स्तर पर लागू किया जाएगा।

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