मृत्युदंड पर बहस का यह सही वक्त नहीं
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किसी भी राष्ट्र में आम आदमी का भरोसा बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि देश की करेंसी और न्यायपालिका पर पूरा भरोसा हो। मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट और उसके बाद की परिस्थितियों पर गौर करते हुए मैंने महसूस किया है कि बाहरी आतंकियों की भारत को ध्वस्त करने की रणनीतियों में इन दो चीजों को ही निशाने पर लिया गया है। इसलिए एक तरफ वह कसाब और उसके साथियों के जरिये सोच-समझकर मुंबई जैसे आर्थिक शहर पर हमले करवाते हैं, दूसरी ओर याकूब मेमन की फांसी के मामले में ऐसा माहौल खड़ा करने की अपेक्षा रखते हैं कि भारत में न्याय नहीं मिलता। एक तरह से आतंकवाद इन हालात को खड़ा करके ही देश में अराजकता फैलाने का मंसूबा रखता है। अफसोस यही है कि भारत में बौद्धिक वर्ग का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष तौर पर इस चाल में आकर फंस जाता है।
याकूब मेमन को सजा दिलाने के लिए पूरे देश को एक साथ दिखना चाहिए था, लेकिन यहां पर ऐसा हुआ नहीं। याकूब की फांसी से पहले ही नहीं अब भी यही माहौल बनाया जा रहा है, मानो न्यायपालिका ने फैसले में जल्दबाजी दिखाई है। जबकि भारत की सर्वोच्च अदालत ने देर रात फैसला देकर संदेश दिया कि यहां 24 घंटे न्याय के लिए दरवाजे खुले हैं। आतंकी भी रात के समय अपने लिए न्याय की फरियाद कर सकता है। अप्रैल 2015 में याकूब को फांसी का डेथ वांरट मिलने के बाद से ही एक सुनियोजित प्रयास शुरू हो गया था कि भारत में न्याय नहीं मिलता। कुछ बड़े-बड़े लोग इसमें शामिल हुए। एक तरह से कुछ लोग इसमें अपनी राजनीति भी करना चाहते थे। तब मुझे यह कहते हुए संकोच नहीं होता कि मीडिया की भूमिका भी बहुत साफ नहीं थी। मैं आपका ध्यान रॉ के दिवंगत अधिकारी बी रमन के लेख की तरफ ले जाना चाहता हूं। उन्होंने याकूब को फांसी न देने की पैरवी की थी। सबसे पहले यह जानना चाहिए कि याकूब इस बेहद संगीन बम सीरियल कांड में कोई सामान्य गुनहगार नहीं था।
न्यायिक परिभाषा में साजिश करने वाले और उसके मुताबिक काम करने वाले में फर्क है। साजिश करने वाले को ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। इस नाते याकूब मेमन साजिश करने वाला था। उसकी भूमिका फिल्म के निर्देशक की तरह है। किसी फिल्म की सफलता या असफलता के लिए जिम्मेदार निर्देशक को ही माना जाता है। मुंबई के बम कांड के लिए याकूब की भूमिका बेहद संगीन थी। रमन 1994 से 2007 तक खामोश रहे। फिर एकाएक याकूब की बेगुनाही की बात करने लगे। क्या सचमुच याकूब निर्दोष था? क्या कोई बता सकता है कि याकूब ने समर्पण के बाद भारत को किसी तरह की मदद दी। बल्कि आखिर तक वह यही सोचता था कि बेहतर वकीलों की मदद से वह किसी न किसी तरह छूट जाएगा। याकूब अपने भाई को नेपाल से नहीं लाया। उसने कभी अपना मुंह नहीं खोला। और अगर यह मान भी लें कि उसने आत्मसर्मपण किया था, तो क्या इससे उसका संगीन जुर्म कम हो जाता? कहीं भी यह तथ्य सामने नहीं आया कि याकूब को किसी तरह का कोई भरोसा दिलाया गया। फिर तो दाऊद इब्राहिम भी इसी तरीके से भारत आ जाएगा कि उसे जुर्म की सजा नहीं मिलेगी। इन स्थितियों को बहुत गंभीरता से देखा जाना चाहिए। तमाम दलीलों में कोई आधार नहीं था। इसलिए न्याय व्यवस्था अपने फैसले पर अडिग रही। जिस तरह जांच एजेंसी, अदालत के फैसले पर सवाल उठने लगे वह दुर्भाग्यपूर्ण है। कुछ लोग जब कहते हों कि अदालत ने मामले को जल्दबाजी में देखा तो उन्हें समझना चाहिए कि ढाई दशक से ज्यादा समय में अब तक केवल एक अपराधी सजा पाया है।
अफजल गुरु, कसाब और अब याकूब मेमन को फांसी देने का एक ही संदेश है कि भारत की राष्ट्रीयता को छिन्न भिन्न करने वालों को बक्शा नहीं जाएगा। हालांकि तीनों को एक ही उद्देश्य से प्रेरित किया गया, लेकिन इन तीनों मामलों को अलग-अलग ढंग से देखा जाना चाहिए। जब 1993 में मुंबई का बम ब्लास्ट किया गया, तो हमारे देश के कुछ लोगों को उकसाया गया। पाकिस्तान ने हमारे देश के लोगों की मदद ली। जब कसाब और उसके साथी यहां आए, तो उसमें सारे पाकिस्तान के आतंकी थे। जबकि भारतीय संसद पर हमला करने के मंसूबे इस हालात के लिए थे कि भारत अस्थिर हो जाए, तो दुनिया में संदेश जाए कि कश्मीर के लोग भारत से आजादी चाहते हैं। अफजल गुरु का इस्तेमाल इसी उद्देश्य के साथ था।
अजीब सी बात है एक तरफ हम कहते हैं कि ढाई दशक बाद किसी को सजा हो रही है, तो दूसरी तरफ हम जल्दबाजी में किया फैसला भी बताते हैं। दोनों ही बातें एक साथ नहीं हो सकती है। लेकिन खतरनाक प्रवृति उस प्रबुद्ध समाज के साथ है, जो एकदम आंतकियों के लिए ढाल बन कर खड़ा होने की कोशिश करता है। अगर फांसी की सजा पर ही उनका एतराज है, तो इसकी आवाज उठाने का एक अलग अवसर हो सकता है।
( वेद विलास उनियाल से बातचीत के आधार पर)