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लड़के गिनती के थे। खानापूर्ति के लिए एक-आध लड़की भी थी। लड़कों में भी कम से कम आधे तो आउटसाइडर ही थे। अंदरूनी मामले तय करवाने में बाहरी तत्व यहां भी अहम भूमिका निभा रहे थे। सदियों पुराने नारे हेर-फेर के साथ लगाए जा रहे थे। वैसे भी कुछ नया गढ़ना बच्चों का खेल थोड़े ही है। रही बात ‘आवाज में असर’ की, तो उसके लिए न तो कोई ‘बेकरार’ था और न ही ‘पत्थर पिघलाना’ यहां मौजूद लोगों में से किसी का भी उद्देश्य था! यहां तो सिर्फ एक ही मुद्दा था-हाउ टू मेक फन, हाउ टू हैव अ गुड टाइम पास, हाउ टू डू समथिंग डिफरेंट! यूनिवर्सिटी कैंपस की सड़कों पर ये युवा हमेशा की तरह मौज-मस्ती कर रहे थे और बीच-बीच में जोर से नारे भी लगाते जा रहे थे-हमारी मांगें पूरी करो! वी वांट ट्वंटी-20!
लोगों ने सोचा, भला यह भी कोई नारा लगाने की चीज है! जब क्रिकेट विश्व में ट्वंटी-20 मैच सुपर हिट हो गए हैं, तो कॉलेज-यूनिवर्सिटी में भी ट्वंटी-20 देर-सबेर शुरू हो ही जाएंगे। इसमें आंदोलन करने की क्या बात है? पर बात ट्वंटी-20 क्रिकेट की थी ही नहीं। मांग यह थी कि फटाफट के इस दौर में क्लासेज का टाइम पीरियड भी घटाकर बीस मिनट कर दिया जाए। यह पूछे जाने पर, कि इतने कम टाइम पीरियड में तो सिर्फ अटैंडेंस ही हो पाएगी, उन छात्रों का जवाब था कि यही तो वह इकलौता महत्वपूर्ण काम है, जिसके लिए उन्हें न चाहते हुए भी कक्षाओं में जाना पड़ता है। यदि कक्षाएं बीस मिनट की कर दी जाएं, तो शायद कोई छात्र क्लास में जाना माइंड नहीं करेगा। अटैंडेंस के अलावा कम से कम एक-दो जरूरी एसएमएस, अथवा वाट्सएप का जवाब तो वे आराम से दे ही लेंगे। वैसे भी बाहर कॉरिडोर में बहुत शोर होता है, और लैक्चर शॉर्टेज की टेंशन रहती है, सो अलग। इससे एडमिनिस्ट्रेशन को भी फायदा होगा। पहले लेक्चर शॉर्ट करने, फिर बाद में उन्हें पूरा करने का कोई झमेला ही नहीं रहेगा।
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