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आपदा से परेशान तो वे भी हैं

Sun, 21 Sep 2014 07:24 PM IST
सहीराम
सहीराम Updated Sun, 21 Sep 2014 07:24 PM IST
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They are also in trouble from disaster

आपदा तो आपदा ही होती है, जी। इसके लिए किसी को कोसना हो, तो इंसान इंसान को ही कोसता है, क्योंकि भगवान को तो कोस नहीं सकते। न प्रकृति पर दोष डाल सकते हैं। क्योंकि वे दोनों अपनी ताकत दिखा चुके हैं। फिर भी प्राकृतिक आपदाओं का मौका ऐसा होता है कि लोग अपने गिरेबान में झांकने लगते हैं। जैसे श्मशान में आदमी तत्वज्ञानी हो जाता है, वैसे ही प्राकृतिक आपदा के वक्त इंसान उदात्त हो जाता है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, तो कुछ और ऐसी अच्छी बातें सामने आने लगती हैं, जिन्हें हम रोजमर्रा की आपाधापी में भूल चुके होते हैं। जैसे कि सब लोग स्वार्थी नहीं होते। कुछ फरिश्ते भी होते हैं। पर लोग जब भगवान को ही याद नहीं रखते, तो फरिश्तों को कहां याद रखेंगे?

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अब देखिए, कश्मीर में प्राकृतिक आपदा आई, तो तनावग्रस्त चल रहे भारत-पाक रिश्तों के बीच की बर्फ भी पिघल गई। अभी तक सीमा पर गोलाबारी हो रही थी। पर बाढ़ ने सीमा रहने ही नहीं दी। इधर भी पानी, उधर भी पानी। वरना मजाल है कि इधर के पानी के साथ बहकर उधर कुछ चला जाए। पिछले दिनों एक सिपाही बहकर सीमा के उस पार चला गया था, तो कितना हंगामा हुआ था। पर पिछले दिनों जब सब कुछ पानी-पानी हो गया, तो गोलाबारी बंद हुई और बातचीत शुरू करने की इच्छा भी देखी गई।
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यह अलग बात है कि अलगाववादियों में ऐसी उदारता अभी नहीं आई है। वे सेना के राहत कार्यों में बाधा डाल रहे थे और सेना से छीनकर खुद राहत सामग्री बांटते हुए ऐसा जता रहे थे, मानो वे चीजें उन्होंने खुद मंगाई हैं। एक विघ्नसंतोषी को सेना का राहत बांटना अच्छा नहीं लगा, उन्होंने पाकिस्तान से राहत सामग्री की गुजारिश की। उन्हें यह पता नहीं कि पाकिस्तान हमसे भी बदतर स्थिति का सामना कर रहा है। और गर्दन तक डूबे कई सिरफिरे चुप हैं कि पानी पूरी तरह उतर जाए, तो वे घुसपैठ और गोलीबारी की तैयारी करें। दोनों तरफ सब कुछ ठीक हो जाएगा, तो खुद उनकी दुकान बंद नहीं हो जाएगी?
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