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तब सूरज का सातवां घोड़ा नहीं था

Sat, 25 May 2013 08:38 PM IST
प्रेम कुमार
प्रेम कुमार Updated Sat, 25 May 2013 08:38 PM IST
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then sun have not seventh horse

कुछ-कुछ वजनी और बड़ा सा वह लिफाफा। रूप-रंग में अलग और खास सा। प्रेषक का नाम-पता कई बार पढ़ा पर परिचित होने जैसा कुछ भी तो याद नहीं आया। उतावली हो उठी जिज्ञासा के साथ उसे खोला-

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फुलस्केप साइज में थी एक चिट्ठी। मैं विस्मित था। आज के इस दौर में हाथ से लिखा यह इतना लंबा पत्र। ऊपर बाईं ओर मोबाइल नंबर के  साथ लिखा था, एम.एम.राय, सेवानिवृत्त डिप्टी कमिश्नर, व्यापार कर। दाहिनी तरफ-174, टैगोर टाउन, इलाहाबाद।
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पत्र को पढ़ने के बीच जिए गए सिहरन-पुलकन भरे प्रभावों-अहसासों के बारे में कुछ और कहने की जगह सीधे-सीधे प्रस्तुत है उस पत्र का यह अंश-

"मैं आपको यह पत्र लिखने के लिए इस कारण व्याकुल हो उठा, क्योंकि आप इस तथ्य से संभवत: अनभिज्ञ न होंगे कि बंबई पलायन करने से पूर्व श्री भारतीजी की कर्मभूमि इलाहाबाद रही। इलाहाबाद में एक मोहल्ला है अतरसुइया, जहां भारती जी अपने मामा के निवास स्थान पर रहते हुए शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।
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संभवत: कम आयु में उनके पिता का साया उन पर से उठ गया था, जिस कारण वह अपनी पूजनीय मां के साथ श्री जौहरी जी के यहां रहते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तत्कालीन सुप्रसिद्ध दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल, दरियाबाद (वर्तमान नाम मीरापुर), इलाहाबाद में हाई स्कूल तक हुई। उसके पश्चात इंटरमीडिएट केवी कॉलेज तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त कर विश्वविद्यालय में अध्यापक के पद पर नियुक्त हो गये थे।

कहने का तात्पर्य यह है कि प्रयाग ने उन्हें सृजनात्मक शक्ति प्रदान की। जब वह वर्ष, 1939-40 में हाईस्कूल में पढ़ रहे थे, तब स्कूल में छात्रों का एक संगठन था, जिसका नाम ‘हेल्थ एसोसिएशन’ था। वे उसके प्रेसिडेंट नियुक्त किए गए थे। उस समय की एक समूह फोटो मेरे पास है।

इसमें वर्ष 1939 में भारती जी की छाया एवं काया कैसी थी यह जानकर आपको और भारती जी की पुत्री प्रज्ञा को हैरानी होगी। मैं उसकी प्रति आपके पास भेजना चाहता हूं ताकि इस दुर्लभ फोटो को आप प्रज्ञा तक पहुंचा दें। मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि वर्ष 1939 की वह फोटो मेरे पास कैसे उपलब्ध है।

मैं यह नहीं जानता कि भारती जी ने कभी अपने बचपन या शैशव काल की अथवा इलाहाबाद निवास की चर्चा अपने परिवार के सदस्यों से की थी या नहीं। भारती जी जब तक इलाहाबाद में रहे, उनके स्कूल एवं कॉलेज के समय के अध्यापक स्व. एमजी गौड़, उनके संरक्षक बने। वह बादशाही मंडी इलाहाबाद में रहते थे।

नित्य, प्रतिदिन भारती जी वहां आते थे और हर बात पर उनसे राय व मशवरा लिया करते थे। यदि भारती जी ने अपनी कोई डायरी लिखी होगी तो उनका नाम निश्चय ही लिया होगा। मैं एक तरह से उनका गुरुभाई हूं। मेरे पिता स्व. एपी राय ने उन्हें डीएवी हाई स्कूल और केवीकॉलेज में पढ़ाया था, जिस कारण जिस फोटो का उल्लेख मैं कर रहा हूं वह मेरे पास उपलब्ध है। आशा है कि आप इस पत्र का उत्तर अवश्य देंगे, जिसके उपरांत ही मैं वह समूह फोटो आपके पास भेज दूंगा।"

उत्फुल्ल हुआ मन अधीर हो उठा। तुरंत फोन किया। देर तक ढेर सारी बातें कीं। बातों के बीच उन्होंने जल्दी ही फोटो भेज देने का वादा किया। एक दिन मैं विभाग में था कि अचानक एक सौम्य सुदर्शन से युवक ने आकर अभिवादन किया- "मैं समीर राय...श्री मुरारी मोहन जी का बेटा। यहां नरौरा एटोमिक प्लांट में हूं। पिताजी ने कहा था कि....।"

खाकी रंग का वह बड़ा मजबूत सा लिफाफा समीर ने मेरी ओर बढ़ाया। अंदर एक चिट्ठी थी- "मैं अपने वायदे के अनुसार आपके पास श्री धर्मवीर भारती की फोटो भेज रहा हूं, जो वर्ष 1939-40 सत्र में हेल्थ एसोसिएशन डीएवी हाईस्कूल इलाहाबाद के ऑफिस ब्रीयरर्स के साथ खींची गई थी। चूंकि यह उनका संभवत: अप्राप्त एवं दुर्लभ चित्र है, अत: आपके उपयोग हेतु प्रेषित कर रहा हूं। आप चाहें तो इसकी एक प्रति उनके परिवार को प्राप्त करवा दें।"

फोटो के साथ अंग्रेजी में खड़े-बैठे लोगों के लिखे नाम वाला एक कागज। उस कागज की सहायता से जान पाया कि बैठे हुए लोगों में-बाईं से दाईं ओर तीसरी कुर्सी पर जो एक पतला-लंबा, प्यारा-भोला सा लड़का बैठा है- वही तो तबका धर्मवीर और बाद का धर्मवीर भारती है। एक सुखद आश्चर्य में डूब गया था मैं।


आज के अपने इस जमाने में जब मूल्यवान से मूल्यवान चीज की भी व्यक्ति हिफाजत नहीं कर पा रहा है, औरों का तो क्या खुद को भी जब आदमी संभालकर नहीं रख पा रहा है...तब इस फोटो को एमएम राय बहत्तर से भी अधिक सालों तक इतना सहेज-संभालकर रखे हुए हैं... तो कृतज्ञता का भाव भी मन में जागा। यह भी सोचा कि यह  तसवीर इसकी-उसकी या मेरी-तेरी नहीं, सबकी है। इसलिए इसे सब तक पहुंचाया जाए।

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