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उनकी चुप्पी और कला की हदें

Tue, 25 Oct 2016 08:01 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Tue, 25 Oct 2016 08:01 PM IST
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Their silence and the limits of art
तस्लीमा नसरीन

हाल के दिनों में भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध बेहद कटु हो गए हैं। इसकी शुरुआत उड़ी स्थित सैन्य शिविर में आतंकवादी हमले से हुई। उसके बाद से दोनों के रिश्तों में तनातनी है। सीमा पर दोनों ओर से गोलीबारी हो रही है, जिनमें सैनिक मर रहे हैं। इस बीच पाकिस्तान ने अपने यहां के टीवी चैनलों में भारतीय कार्यक्रमों का प्रसारण रोक दिया है। भारत में भी ऐ दिल है मुश्किल के कटु अनुभव के बाद करन जौहर ने फैसला किया है कि वह आगे से अपनी फिल्मों में पाकिस्तानी कलाकार नहीं लेंगे।

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भारत में पाकिस्तान से जुड़ी तमाम चीजों को प्रतिबंधित करने की बातें की जा रही हैं। पाक कलाकारों को भारतीय फिल्मों में लेने की जरूरत नहीं है। अपने देश में कलाकारों की कमी नहीं है। तथ्य यह भी है कि भारत में जितने भी पाकिस्तानी कलाकार हैं, उन्होंने अब तक खुलकर आतंकवाद की निंदा नहीं की है। उदारवादियों का तर्क है कि पाक कलाकार तो आतंकवादी नहीं हैं, फिर उन पर प्रतिबंध क्यों लगाना। इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। कुछ लोग प्रतितर्क में यह जरूर कह रहे हैं कि पाक कलाकारों का कसूर भले न हो, लेकिन उनके देश ने तो गलती की है।
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अगर मैं पाकिस्तानी कलाकार होती, तो भारत में पाक प्रायोजित आतंकवाद की निंदा करती। भारत में काम करने वाले पाकिस्तानी कलाकार आतंकवाद की निंदा क्यों नहीं कर रहे, यह मैं नहीं जानती। शांति, विश्व बंधुत्व और मानवाधिकार में विश्वास करने वाला कोई भी आदमी आतंकवाद का समर्थन नहीं कर सकता। अगर पाक कलाकार आतंकवाद पर खामोश रहते हैं, तो उनका बहिष्कार किया ही जाना चाहिए। लेकिन यह क्यों नहीं मानना चाहिए कि उनकी खामोशी का कारण भय भी हो सकता है? वे कलाकार भले भारतीय फिल्मों में काम करने आए हैं, लेकिन उनका घर-परिवार तो पाकिस्तान में ही है।
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बगैर किसी दोष के मैं आजीवन बहिष्कार का शिकार हुई। मुझे मेरी मातृभूमि से बेदखल कर दिया गया। ऐसे में मैं बहिष्कार और प्रतिबंध का दर्द समझ सकती हूं। बिना अपराध के किसी को दोषी करार देना मैं स्वीकार नहीं कर सकती। पाकिस्तान के साथ भारत का जो राजनीतिक विवाद है, उसे दोनों को राजनीतिक स्तर पर निपटाना चाहिए। सांस्कृतिक आदान-प्रदान खत्म कर देने की आखिर क्या वजह हो सकती है? बहुतों का तर्क है कि रंगभेद की नीति के कारण जिस तरह दक्षिण अफ्रीका का बहिष्कार किया गया था, आतंकवाद को प्रोत्साहित करने के कारण उसी तरह पाकिस्तान का बहिष्कार करना चाहिए। ऐसे में सिर्फ फिल्मों और कलाकारों को ही नहीं, आपसी व्यापार और राजनयिक संबंधों को भी खत्म करना होगा। क्या यह संभव और व्यावहारिक है? तनाव बढ़कर इस हद तक पहुंच जाए, तो डरना स्वाभाविक है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान, दोनों के पास परमाणु हथियार हैं।

चूंकि मैं एक लेखिका हूं, और दशकों से प्रतिबंध की मार से जर्जर हो चुकी हूं, इसलिए प्रतिबंध की नीति से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हो पाती। अगर किसी को इच्छा न हो, तो पाक कलाकारों वाली भारतीय फिल्में न देखने के लिए वह स्वतंत्र है। किसको क्या देखना है, क्या नहीं, इतनी स्वतंत्रता तो रहनी चाहिए। मैंने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जब ऐसा कहा था, तो मुझे निशाना बनाया गया। यह कहा गया कि मुझे भारत से निकाल देना चाहिए। बता दूं कि भारत का न होने के बावजूद भारत से मुझे कोई कम प्यार नहीं है। यह वह देश है, जिसने संकट के समय न केवल मुझे शरण दी, बल्कि मुझे प्यार से अपनाया भी। भारत के जिस भी हिस्से में मैं गई हूं, वहां मुझे प्यार ही मिला है।

मैं यहां यह भी बता दूं कि भारत सरकार ने अभी तक किसी पाकिस्तानी कलाकार को देश छोड़कर जाने के लिए नहीं कहा है। जिन भारतीय फिल्मों में पाकिस्तानी कलाकारों ने काम किया है, उन पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा भारत सरकार ने नहीं की है। फिर पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ किसी ने फरमान क्यों जारी किया है, यह मेरी समझ में नहीं आता। आंख के बदले आंख लेने की मानसिकता ही अगर प्रबल हो जाए, तो यह किसी समाज का स्वस्थ लक्षण नहीं है। इससे कौन इन्कार करेगा कि पाकिस्तान पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से भारत के खिलाफ जिस तरह आतंकवाद को प्रायोजित कर रहा है, वह मानवता के जघन्यतम अपराधों में से है? इसके लिए अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में वह घृणा का पात्र भी है।

पाकिस्तान में भारत-विद्वेषी लोग हैं, तो भारत की उन्नति को देख, मानवाधिकार के उसके रिकॉर्ड को देख सराहने वाले लोग भी कम नहीं हैं। पाकिस्तान के भीतर इस्लामाबाद की रीति-नीतियों की आलोचना करने वाले लोगों की संख्या भी बहुत है। बलूचिस्तान के निरीह लोगों का इस्लामाबाद दशकों से जिस तरह शोषण कर रहा है, उसके खिलाफ दुनिया भर के लोगों में क्षोभ और गुस्से की लहर है। इन सबके बावजूद पाकिस्तान में शिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत लोगों का जो एक तबका है, उसकी अनदेखी कर हमें पूरे पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक क्यों मान लेना चाहिए? पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति के लिए वहां के शासक जिम्मेदार हैं। भारत के साथ ही वह आजाद हुआ, लेकिन आतंकवाद को पुष्पित-पल्लवित करने की आत्मघाती नीति ने उसे कहां पहुंचा दिया?


राजनेताओं में साहित्य-संस्कृति-कला पर अंकुश लगाने की पुरानी आदत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बावजूद किताबों और फिल्मों पर प्रतिबंध लगते रहते हैं। इस मामले में सिर्फ भारत को ही दोष क्यों दिया जाए! लेकिन चूंकि भारत ने मुझे मुसीबत के क्षणों में शरण दी है, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुकाबले इसने विश्व मंच पर खुद को लगातार साबित किया है, भारत की लोकतांत्रिक शक्ति, उदारता और प्रेम-अपनेपन से मैं बेहद प्रभावित हूं, इसलिए आंख के बदले आंख की मानसिकता को मैं दिल से स्वीकार नहीं कर सकती। इसलिए मैं कहती हूं, साहित्य-कला और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला।

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