न्यू इंडिया में इनकी जगह
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पिछले रविवार को अपने 'मन की बात' रेडियो कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश का हर आदमी महत्वपूर्ण है और न्यू इंडिया में भागीदार है। उन्होंने युवाओं से कंफर्ट जोन (सुविधाजनक हालात) से बाहर निकलने, जीवन के नए अनुभव हासिल करने, नई जगहें देखने, नए काम करने, नए हुनर सीखने और उस भीम मोबाइल एप का इस्तेमाल करने के लिए कहा, जिसे प्रधानमंत्री ने विगत दिसंबर में लांच किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार के ई-वैलेट का उल्लेख करते हुए कहा, भीम एप का इस्तेमाल कीजिए, दूसरों को इस बारे में बताइए और इस तरह कुछ ज्यादा पैसे कमाइए।
अपने यहां कम ही नौजवान होंगे, जो अतिरिक्त पैसा कमाने का अवसर यों ही गंवा देना चाहेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री का यह सुझाव उन्हें अवश्य ही लुभावना लगा होगा। लेकिन कोई और चिंता उन्हें परेशान करती होगी : यह चिंता रोजगार की है। आज के भारत में रोजगार कहां है? और देश में सालाना कितने रोजगार सृजित हो रहे हैं? हाल के दिनों में ऐसी अनेक खबरें आई हैं, जो रोजगार की चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं। अगर मैं युवा होती और रोजगार ढूंढ रही होती, तो यह स्थिति मुझे परेशान कर देती।
वर्ष 2014 से देश में सालाना 3.4 लाख रोजगार सृजित हो रहे हैं। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने 2009 से 2014 तक सालाना जितने रोजगार पैदा किए, यह आंकड़ा उसका आधा है। वस्त्रोद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में पिछले तीन साल में रोजगार का परिदृश्य बेहतर था। लेकिन कई विकसित देशों द्वारा संरक्षणवादी रवैया अपनाने के कारण हाल के दौर में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी रोजगार का आंकड़ा सिकुड़ गया है। चमड़ा, ऑटोमोबाइल, रत्न और आभूषण, ट्रांसपोर्ट, खनन तथा हैंडलूम और पावरलूम जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रोजगार सृजन पिछली सरकार के दौर में ज्यादा था।
इसमें संदेह नहीं कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती और संरक्षणवाद के कारण रोजगार के क्षेत्र में तस्वीर धुंधली हुई है। इस वजह से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्यात घटा है। यहां तक कि सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र में भी अब रोजगार की गारंटी नहीं है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत युवाओं का देश है और रोजगार तथा कामकाज का अभाव युवाओं को सर्वाधिक प्रभावित करता है।
भारत की जनसंख्या 1.2 अरब है, जिसका दो तिहाई हिस्सा 35 साल से कम उम्र का है। भारत में दुनिया की सर्वाधिक युवा आबादी रहती है। अगर आप आशावादी हैं, तो मानेंगे कि एक ऐसे दौर में, जब विकसित देश तो छोड़ दीजिए, चीन जैसे देश भी अपनी बढ़ती उम्रदराज आबादी से परेशान है, तब भारत का सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश होना कितना लाभदायक है। लेकिन अगर युवाओं की इतनी बड़ी आबादी को रोजगार न मिला तथा इनके भविष्य को धुंधला बनाता हुआ रोजगार का बाजार निरंतर सिकुड़ता जाए, तो इस तथाकथित 'जनसांख्यिकी लाभांश' के विस्फोटक बनते भी देर नहीं लगेगी। अगर देश के युवाओं को रोजगार और कामकाज नहीं मिलता, तो कौन से मोबाइल एप का कब इस्तेमाल करें-जैसी चीजों के बारे में सोचने में भी वे रुचि नहीं दिखाएंगे।
यह भी अजीब विरोधाभास है कि हमारे यहां रोजगार के सिकुड़ते बाजार के साथ प्रतिभा की कमी की समस्या भी भीषण रूप से विद्यमान है। एक तरफ रोजगार के बाजार में संभावनाएं कम हैं, दूसरी तरफ शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले युवाओं में उस स्तर की प्रतिभा का अभाव है, जितनी संबंधित नौकरियों के लिए चाहिए। इसके ब्योरे हैं कि खासकर सूचना प्रौद्योगिकी और साइंस इकोसिस्टम में रोजगार ढूंढते युवाओं में प्रतिभाओं की भारी कमी है। हाल ही में जारी एक आंकड़े में दावा किया गया है कि इस देश के 95 प्रतिशत इंजीनियर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के क्षेत्र में नौकरी करने के लायक नहीं हैं।
पिछले सप्ताह यह तथ्य सामने आया कि देश के 122 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज पिछले साल से एक के बाद एक बंद हो रहे हैं। इसका मतलब यह है कि ये कॉलेज अब नए एडमिशन नहीं कर पाएंगे, हालांकि इनमें पहले से पढ़ाई कर रहे छात्रों पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा। ये निजी इंजीनियरिंग कॉलेज महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में अधिक हैं। कोई यह कह सकता है कि जो निजी इंजीनियरिंग कॉलेज बाजार में बने नहीं रह सकते और जिनकी डिग्रियों का ज्यादा मोल नहीं है, उन्हें बंद ही हो जाना चाहिए। लेकिन उन छात्र-छात्राओं का क्या होगा, जिनके परिवारजनों ने उन्हें इन कॉलेजों में पढ़ाने में अपने पैसे खर्च किए? जब इस तरह के संदिग्ध कॉलेज देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे थे, तब इन पर नजर रखने वाली विनियामक संस्थाएं क्या कर रही थीं? अगर इंजीनियरिंग की डिग्री और डिप्लोमा धारी युवाओं का यह हाल है, तब कल्पना की जा सकती है कि जो स्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाए या जिनके पास तकनीकी डिग्रियां नहीं हैं, उनका क्या हाल होगा? न्यू इंडिया में उनका क्या भविष्य है?
इस परिदृश्य के लिए कोई मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को दोषी ठहरा सकता है, जिसमें रटने पर जोर दिया जाता है और जिसमें युवाओं को हुनर सिखाने और उनकी सोच बदलने की कोशिश नहीं की जाती। देश के युवा ऐसी डिग्रियों के साथ बाहर निकल रहे हैं, जो उन्हें कुछ नहीं सिखातीं। ऐसे दौर में इस शिक्षा का कोई मतलब ही नहीं है, जब नवाचार का महत्व बढ़ने के साथ तकनीक की गति भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में, शिक्षा की कमजोर बुनियाद वाले इन लाखों छात्रों का क्या होगा!
यह समस्या इतनी गहरी है कि रातोंरात इसका समाधान नहीं निकल सकता। लेकिन अच्छा होगा, अगर आगामी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री घटते रोजगार के मुद्दे पर कुछ कहें। हर युवा सफल उद्यमी नहीं बन सकता। इस देश के लाखों युवा रोजगार का इंतजार कर रहे हैं। इस मामले में वे निश्चय ही दिशा-निर्देश चाहते हैं।