फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The real test is now

असली परीक्षा तो अब है

Sun, 08 Feb 2015 06:19 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 08 Feb 2015 06:19 PM IST
विज्ञापन
The real test is now

इस वक्त देश की राजधानी में उत्तेजना अपने चरम पर है। विधानसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं और एक्जिट पोल भी आ चुका है, जिसमें आम आदमी पार्टी सबसे आगे दिखाई दे रही है। फिर भी मंगलवार को नतीजे आने तक राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म तो रहेगा ही।

विज्ञापन


गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान विभिन्न दलों के राजनेताओं ने मतदाताओं से तमाम वायदे किए। इनमें दिल्ली को विश्व स्तर का शहर बना देने का वायदा भी था। आखिर यह 'वर्ल्ड क्लास सिटी' होती क्या है, और यह कैसे बनती है? आश्चर्य की बात तो यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली को रहने लायक बनाने के मुद्दे पर शायद ही किसी का ध्यान गया। किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अपने घोषणापत्र या भाषणों में स्वच्छ हवा के मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। जबकि हालिया आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण के लिए कुख्यात चीन की राजधानी बीजिंग की तुलना में दिल्ली की आबोहवा 45 फीसदी ज्यादा प्रदूषित हो गई है। ऐसा कोई महानगर विश्व स्तर का भला कैसे हो सकता है, जहां के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हों?
विज्ञापन


प्रति व्यक्ति आय के मामले में दिल्ली ने बेशक शानदार छलांग लगाई है। वर्ष 2004-05 की तुलना में 2013-14 में यहां प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो जाने का अनुमान है। इसके बावजूद रहने लायक माहौल्ा के मामले में दिल्ली पीछे जा रही है। इसकी मुख्य वजह वायु प्रदूषण है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2008 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, दिल्ली के 32 प्रतिशत बच्चों में सांस संबंधी समस्याएं थीं, जबकि ग्रामीण बच्चों में यह आंकड़ा 18.2 फीसदी था। उसी सर्वेक्षण के मुताबिक, दिल्ली के 43.5 फीसदी स्कूली बच्चों के फेफड़े की काम करने की क्षमता घट गई है, जबकि ग्रामीण भारत के बच्चों में यह आंकड़ा 25.7 फीसदी था।
विज्ञापन
विज्ञापन


दिल्ली के डॉक्टरों की मानें, तो वर्ष 2000 से 2005 के बीच यहां सांस संबंधी बीमारियों में गिरावट आई है, मगर उसके बाद से यह फिर से बढ़ने लगी है। गौरतलब है कि 2000 में दिल्ली में पंजीकृत सभी बसों, ट्रकों, टैक्सियों और ऑटो रिक्शा में सीएनजी की व्यवस्था की गई, जिसके बाद से वायु की गुणवत्ता में सुधार भी आया। मगर सड़कों पर वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या ने पांच वर्ष के भीतर ही दिल्ली की हवा को पहले जैसा ही प्रदूषित बना दिया। हालांकि शहर की हवा को स्वच्छ बनाने की तमाम कोशिशें भी हुईं। मसलन, सीसा युक्त पेट्रोल को चरणबद्ध ढंग से हटाया गया, मगर इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ा।

इंजन की परिष्कृत तकनीक, उत्सर्जन के कड़े मापदंड, गुणवत्तापूर्ण ईंधन और यातायात प्रबंधन और नियोजन से भी स्थिति में अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिला। दरअसल, वाहनों की बढ़ती संख्या ने सब किए-धरे पर पानी फेर दिया। अब देश की राजधानी से 15 वर्ष से पुराने वाहनों को हटाने की बात हो रही है, लेकिन नए वाहनों की संख्या जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसे देखते हुए इस कदम का अप्रभावी होना भी तकरीबन तय है। इसका सर्वाधिक खामियाजा सांस से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित लोगों को भुगतना होगा। बदतर होते हालात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अब दिल्ली उच्च न्यायालय शहर में बढ़ते वायु प्रदूषण का मामला अपन हाथ में लेने की योजना बना रहा है।

ऐसे में दिल्ली करे, तो क्या करे? उसे दूसरे देशों से सीखना चाहिए। अब चीन को ही लें। आर्थिक कामयाबी के घोड़े पर सवार यह देश भी पर्यावरणीय सवालों से जूझ रहा है। अगले महीने, चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस का वार्षिक सम्मेलन होना है, जिसमें वहां का कम्युनिस्ट नेतृत्व देश की 13वीं पंचवर्षीय योजना पर चर्चा करेगा। टिकाऊ विकास को गति देने और चीन की तीव्र आर्थिक प्रगति की गवाह बनती जहरीली हवा को स्वच्छ करना ही इस योजना का उद्देश्य है। प्रदूषण से निपटना ही कांग्रेस की मुख्य थीम होगा।

चीन में सरकारी प्रतिबंधों के चलते वायु प्रदूषण की समस्या से जुड़ी खबरें वर्षों तक बाहर नहीं आ सकीं। मगर जनवरी, 2013 में पूरे उत्तरी चीन में प्रदूषण में बढ़ोतरी के बाद इन प्रतिबंधों में ढील दे गई। अब आलम यह है कि चीन की सरकारी समाचार एजेंसियां भी बढ़ते वायु प्रदूषण की खबरें नियमित तौर पर कवर कर रही हैं। बीजिंग सरकार एक वर्ष में बिकने वाली कारों की संख्या तय कर चुकी है। एक समय था, जब देश की राजधानी को काले धुएं ने घेर रखा था, मगर अब वहां कोयले के उपयोग पर प्रतिबंध, फैक्टरियों की बंदी और ईंधन के नए मापदंड जैसे उपायों से हालात बेहतर हुए हैं। बीजिंग के मेयर वांग अंशुन कहते हैं, 'हम वित्तीय सहयोग बढ़ाएंगे, प्रमुख क्षेत्रों में कोयले के उपयोग पर रोक लगाकर सभी छह शहरी जिलों में कोयला आधारित संयंत्रों को बंद करेंगे और कोयले के उपभोग में कमी लाएंगे।'


चीन और भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में पर्यावरण के मानकों पर खरा उतरने का लक्ष्य इतना आसान नहीं होगा। मगर कहीं से तो शुरुआत करनी ही होगी। दिल्ली में जो भी सरकार बनाए, उसे यह साफ करना होगा कि वह हवा को स्वच्छ बनाने के लिए कौन-से कदम उठाती है। लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि बतौर नागरिक हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं। बीजिंग में सरकार की आंख तब जाकर खुली, जब शहर के हजारों बाशिंदों ने वहां की प्रदूषित होती हवा को लेकर अपनी परेशानियों को सोशल मीडिया के जरिये बांटना शुरू किया। हालांकि अभी बीजिंग में वायु प्रदूषण के मोर्चे को लेकर काफी कुछ किया जाना बाकी है, मगर इस दिशा में एक गंभीर शुरुआत तो हो ही चुकी है। दिल्लीवासियों को भी ऐसा ही कुछ करना होगा।

-विकास संबंधी मुद्दों पर लिखने वाली वरिष्ठ स्तंभकार

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed