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राजनीतिक दांव-पेच से दूर ही रखें सेना को

Fri, 25 Apr 2014 08:19 PM IST
शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Updated Fri, 25 Apr 2014 08:19 PM IST
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The political stakes - Keep away from pedal force

पिछले तीन वर्षों में सेना प्रमुख की नियुक्ति एक बार फिर विवादों के घेरे में आती नजर आ रही है। इस बार दलवीर सिंह सुहाग वरिष्ठता एवं योग्यता के आधार पर कतार में सबसे आगे हैं। परंतु पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वी के सिंह, जो भारतीय जनता पार्टी की तरफ से रक्षा विषयों पर प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं, अपने पूर्वाग्रहों के कारण जनरल सुहाग को इस पद पर नहीं देखना चाहते। वह इस पद पर अपने समधी जनरल अशोक सिंह को लाना चाहते हैं, जो जनरल सुहाग से जूनियर हैं।

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1947 से लेकर आज तक केंद्र सरकारों की कोशिश सेना के अराजनीतिक स्वरूप को बनाए रखने की रही है और इसके लिए सेना की नियुक्ति एवं पदोन्नति को राजनीति से दूर रखा गया है। इस प्रक्रिया में केवल योग्यता एवं वरीयता को ही आधार माना जाता है। भारतीय सेना को छह ऑपरेशन कमांडो में बांटा गया है और ये हैं उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिण-पश्चिमी, दक्षिणी, पूर्वी एवं मध्य। इस प्रकार उपसेना प्रमुख एवं छह आर्मी कमांडरों में सबसे वरिष्ठ को सेना प्रमुख का पद सौंपा जाता है। इस समय ले. जनरल दलवीर सिंह सुहाग उपसेना प्रमुख हैं तथा सबसे सीनियर भी हैं। इसीलिए रक्षा मंत्रालय चली आ रही प्रक्रिया के अनुरूप उनके नाम पर केंद्र सरकार की नियुक्ति कमेटी की सहमति प्राप्त करके मोहर लगाना चाह रहा है।
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इस विवाद की शुरुआत जनरल वी के सिंह के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई, जब उनकी जन्मतिथि का विवाद सामने आया था। उस समय यदि वह एक वर्ष और पद पर बने रहते, तो जनरल बिक्रम सिंह सेवानिवृत्त हो जाते और थलसेना प्रमुख नहीं बन पाते। और इस तरह जनरल वी के सिंह के हटते ही जनरल अशोक सिंह के थलसेना प्रमुख बनने का रास्ता साफ हो जाता। उनकी जन्मतिथि के विवाद के कारण पहली बार सेना को राजनीति में घसीटा गया। उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद पर विराम लगाकर देश को इस संकट से उबारा।
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जनरल सुहाग 2011 में 03 कोर के कमांडर थे, जो असम के दीमापुर में है। उसी समय जोरहाट में आर्मी की एक इंटेलिजेंस यूनिट की कैप्टन रूबीना कौर एवं उसके साथियों की एक मुठभेड़ का विवाद सामने आया। सेना ने इसमें भाग लेने वाले सभी कर्मियों के खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई की। कमांडर एक ले. जनरल रैंक का अधिकारी होता है, जिसका इस प्रकार की घटनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता है। फिर भी जनरल वी के सिंह ने दिसंबर, 2011 में जनरल सुहाग को आर्मी कमांडर पद से दूर रखने के लिए उपरोक्त घटना का हवाला देते हुए उन पर डिसिप्लिन ऐंड विजिलेंस बैन (अनुशासन और सतर्कता प्रतिबंध) लगवा दिया। सेना की प्रक्रिया के मुताबिक इस कार्रवाई से संबंधित अधिकारी की तरक्की पर रोक लगा दी जाती है। मगर थलसेना अध्यक्ष बनने के बाद जनरल बिक्रम सिंह ने यह प्रतिबंध हटा दिया। ऐसा नहीं होता, तो जनरल सुहाग न तो आर्मी कमांडर बनते और न ही आज सेना प्रमुख के दावेदार होते।


अब तक केवल एक बार 1982 में वरीयता एवं क्रम को दरकिनार करते हुए जनरल एस के सिन्हा के स्थान पर जनरल ए एस वैद्य को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान सेना प्रमुख बनाया गया था। उस विवाद को देश आज भी याद करता है। जनरल वैद्य की अगुवाई में 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया गया था। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को लगता था कि जनरल सिन्हा उस कार्रवाई को उनके अनुरूप नहीं चला सकें। मगर मूलतः हमारी सेना का स्वरूप अराजनीतिक है। अन्यथा हम अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश के साथ ही अफ्रीकी और अरब देशों को देख सकते हैं, जहां आए दिन सैनिक उथल-पुथल की खबरें सुनने को मिलती हैं।

(लेखक भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्नल हैं)

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