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भ्रष्टाचार: सहकारी बैंकों की सुध लेने का समय... निगरानी तंत्र बहुत ही कमजोर हैं, मजबूत बनाने की जरूरत
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न्यू इंडिया कोऑपरेटिव बैंक (फाइल)
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अमर उजाला
विस्तार
विगत दिनों मुंबई के न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक के 122 करोड़ रुपये के गबन मामले में अदालत ने मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) को संपत्तियां कुर्क करने की अनुमति दी। इसके बाद पुलिस ने पांच आरोपियों की 168 करोड़ की 21 संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ज्ञात हो कि गबन के पश्चात भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने स्थिति को संभालने के लिए तात्कालिक रूप से बैंक से निकासी, नए ऋण देने और जमा लेने पर रोक लगा दी थी। बाद में ग्राहकों को निकासी के मामले में आंशिक रूप से राहत दी गई। फिर भी, ग्राहकों के मन में अब भी भय और संशय की स्थिति बनी हुई है।
कुछ साल पहले पंजाब एवं महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) में हुए घोटाले की वजह से भी ग्राहकों को अपने पैसों की निकासी में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। सहकारी बैंकों में अनियमितताओं और दिवालिया होने की घटनाएं आम हो गई हैं, जिससे छोटे निवेशकों के मन में बैंकिंग प्रणाली के प्रति भरोसा कम हो रहा है। सहकारी बैंकों में अनियमितता या घोटाले का एक बड़ा कारण रिजर्व बैंक और रजिस्ट्रार को-ऑपरेटिव की दोहरी नियंत्रण व्यवस्था को माना जा रहा है। सहकारी बैंकों की स्थापना राज्य सहकारी समिति अधिनियम के अनुसार होती है। भारतीय रिजर्व बैंक नियामक तो होता है, लेकिन उसकी नियमन की भूमिका सीमित होती है। इस बैंक की कार्यप्रणाली में केंद्र सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। इस तरह के बैंकों पर निगरानी का कार्य मुख्य तौर पर राज्य सरकार करती है, जिसके निदेशक सतारूढ़ दल के नेता होते हैं। इन कारणों से सहकारी बैंकों में घोटालों को अंजाम देना आसान होता है।
को-ऑपरेटिव गृह समितियों या आम जनता द्वारा सहकारी बैंकों में पैसा रखने के पीछे एक बड़ा कारण इन बैंकों द्वारा ज्यादा ब्याज की पेशकश करना है। इस वजह से निवेशक लालच में आ जाते हैं। न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक और पीएमसी बैंक भी जमा पर ज्यादा ब्याज दे रहे थे। सहकारी बैंकों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराना और वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करना है, लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से ये उद्देश्य पूरे नहीं हो पा रहे हैं। अब तक रिजर्व बैंक ने 27 सहकारी बैंकों को घोटालों या परिचालन में गड़बड़ी के कारण अपने नियंत्रण में लिया है।
भारत में बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति पर आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में शहरी सहकारी बैंकों की संख्या 1,926 से घटकर 1,472 रह गई है। इस तरह, वित्त वर्ष 2004-05 से लेकर अब तक 156 शहरी सहकारी बैंकों का विलय हुआ है, जिनमें छह शहरी सहकारी बैंकों का विलय 2023 में हुआ है। मौजूदा व्यवस्था में सहकारी बैंकों में अनियमितता को रोकना आसान नहीं है। साथ ही, अधिक ब्याज के लालच में ग्राहक भी ऐसे बैंकों में अपने जीवन भर की पूंजी जमा करना बंद नहीं करेंगे। इसलिए, निवेशकों के भरोसे को अक्षुण्ण रखने के लिए केंद्र सरकार डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (डीआईसीजीसी) एक्ट के तहत मिलने वाले मौजूदा पांच लाख रुपये के बीमा कवर को बढ़ाने पर विचार कर रही है।
डीआईसीजीसी, आरबीआई की स्वामित्व वाली एक संस्था है, जो बैंक डिपॉजिट पर बीमा कवर मुहैया कराती है। बीमा कवर के प्रीमियम का भुगतान ग्राहक की जगह बैंक डीआईसीजीसी को करते हैं। भारत में कार्यरत विदेशी बैंकों की शाखाओं, स्थानीय क्षेत्रीय बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित सभी वाणिज्यिक बैंकों का बीमा डीआईसीजीसी द्वारा किया जाता है। फिलवक्त, बैंक के बंद या दिवालिया होने पर डीआईसीजीसी ग्राहकों को पांच लाख रुपये तक की बीमित राशि का भुगतान करता है। बैंक के डूबने या बंद होने के 90 दिनों के अंदर ग्राहकों को उनके जमा पैसे का भुगतान किया जाता है। प्रभावित बैंक को 45 दिनों में डीआईसीजीसी को खाताधारकों का ब्योरा देना होता है। उसके बाद, शेष बचे हुए 45 दिनों में वह खाताधारकों को पैसे लौटाता है।
यदि किसी जमाकर्ता का बैंक में 10 लाख रुपये जमा है और बैंक डूब जाता है, तो जमाकर्ता को सिर्फ पांच लाख रुपये ही बीमा के रूप में मिलेंगे और बाकी डूब जाएंगे। ऐसे प्रावधान से निवेशकों के मन में डर व्याप्त है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली अब भी मजबूत बनी हुई है। हालांकि, न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक, पीएमसी या दूसरे बैंकों में हुए घोटाले के आधार पर पूरी बैंकिंग प्रणाली को त्रुटिपूर्ण मानना गलत होगा। सहकारी बैंकों के संदर्भ में निगरानी तंत्र बहुत ही कमजोर है, जिसे मजबूत बनाने की जरूरत है।