खाना खराब है
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जी, मिड डे मील से अगर बच्चे बीमार हो जाएं, तो बात समझ में आती है कि इस तरह देश के विकास में वे अपना योगदान करते हैं। वैसे भी गरीब के हिस्से में आनेवाली रोटी में अगर कोई घपला-घोटाला न हो, तो लगता ही नहीं कि देश विकास कर रहा है। विकास अपनी कीमत मांगता है और मिड डे मील से बीमार होकर बच्चे यह कीमत चुकाते हैं। बच्चे देश का भविष्य होते हैं। एक फिल्मी गाने में उनके बारे में कहा गया है कि नेता तुम्हीं हो कल के। सो जरूरी है कि कल के नेताओं को घपले-घोटालों का फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस इसी उम्र में हो जाना चाहिए। पर अब जब यह पता चला कि आज के नेता भी संसद के कैंटीन का खाना खाकर बीमार हो रहे हैं, तो लगता है कि देश में एक लेवल प्लेइंग फील्ड बन चुका है।
ऐसा नहीं है कि संसद के कैंटीन का खाना सस्ता है, इसलिए खराब है। जरूरी नहीं कि सस्ता खाना सिर्फ गरीब का ही हो। आपको याद ही होगा कि पिछली सरकार में राज बब्बर से लेकर रशीद मसूद तक महंगाई के खिलाफ सस्ते खाने का विज्ञापन कर रहे थे कि पांच रुपये में भरपेट खाना मिलता है, कि बारह रुपये में थाली मिलती है। पर जी, सच तो यह है कि सबसे सस्ता खाना तो संसद के कैंटीन का ही होता है। देश में गरीबी की रेखा इसी से तय होती है।
पर अब अगर मिड डे मील से बच्चे बीमार होंगे, तो डर यह है कि शायद यह खबर न भी बने। क्योंकि अब ऐसी खबर का लेवल संसद तक उठ गया है। हालांकि यह भी सच है कि जब से मिड-डे मील खाकर बच्चों के बीमार पड़ने की खबरें आने लगी हैं, दावत खाकर बीमार पड़ने वालों की कोई खबर नहीं बनती।
जब से संसद के कैंटीन के खाने से नेताओं के बीमार पड़ने की खबरें आई हैं, रोड साइड के ढाबेवाले डर गए हैं। उन्हें भय है कि कल को स्वास्थ्य विभाग का कर्मचारी आकर उन्हें धमका सकता है। राजधानी के खराब खाने से इतना आतंक नहीं मचा था, मिड डे मील में सांप, नेवले और चूहे मिलने पर भी ठेकेदार लोग इतना नहीं डरे थे। पर अब डरना लाजिमी है।