लोकसभा चुनाव : जो हुआ, सो याें हुआ !

Raman Singh यशवंत व्यास Published by: Raman Singh
Updated Fri, 24 May 2019 09:43 AM IST
विज्ञापन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें
हमारे एक वरिष्ठ आलोचक मित्र ने पिछले हफ्ते कहा था, हताश आदमी गाली देता है और कमजोर आदमी शाप। अधूरी विजय वाले दुश्मन की कमजोरी पर नजर रखते हैं, पक्की जीत के विजेता दुश्मन की ताकत पर। मोदी विरोध की धुरी इन्हीं बिंदुओं पर घूम रही थी। उधर शाप और गालियां चलती रहीं, इधर  नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीतिक समझ के चलते विरोधियों को अपने ही मैदान में ला खड़ा किया। वे यह रूपक स्थापित करने में सफल रहे कि विरोधियों की सामूहिकता सिर्फ और सिर्फ मोदी के प्रति घृणा और व्यक्तिगत स्वार्थों की जमीन पर टिकी हुई है। जो उनके मुहावरों की नकल करके मुहावरे गढ़ने का जौहर दिखाने में लगे थे उनके पास था भी क्या? यही कि मीडिया बिका हुआ है, कि हर चीज खरीद ली गई है, कि यह आदमी रहा तो लोकतंत्र ही खत्म हो जाएगा। और कि, इस आदमी की वापसी एक 'नीच ट्रेजिडी' होगी। यह कामनाओं का स्वर्ग था।
विज्ञापन


राजनीति हो या जीवन हर एक को सैद्धांतिक रूप से अपनी निष्ठाओं के साथ उपस्थित होना ही चाहिए। लेकिन कामनाएं और यथार्थ दो अलग चीजें हैं। जब आप चाहते हैं कि नारियल को पीपल कहा जाए और जो नारियल को पीपल न कहे, वह बिका हुआ मान लिया जाए तो यह आकलन खुद के लिए ही खतरनाक हो जाता है। यह भी सिद्ध तथ्य है कि संदेह पैदा करना भी युद्ध की एक तकनीक होती है। यह एक कलात्मक चालाकी है कि अपनी कमजोरी ढंकना हो तो दूसरे की क्षमता पर संदेह खड़ा कर दिया जाए। यह चीज अदालत से लेकर रेफरी तक, ईवीएम से लेकर एक्जिट पोल तक- सभी जगह सुविधापूर्वक लागू होती है। लेकिन इससे आगे के रास्ते नहीं खुलते। एक बौद्धिक लड़ैती हो सकती है, मसखरी नकल हो सकती है लेकिन वस्तु सत्य ओझल हो जाता है। इसीलिए विस्मय की बात यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी ब्रांड अपील कैसे बनाई, बल्कि यह है कि अंत तक बहुत से विद्वज्जन क्यों पीपल के पेड़ को नारियल कहलवाने की जिद में ही होम हो गए।


2014 में इन पंक्तियों के लेखक ने लिखा था कि विरोधियों के पास मोदी की इस विजय का एक ही 'तोड़' है। अब दलितों और मुसलमानों का तेज मसाला तैयार किया जाएगा और एकल हिन्दुत्व को ब्राह्मणवादी वर्चस्व के अतीत की भयावह तस्वीर से मिलाकर पेश किया जाएगा। 2019 तक आते-आते विपक्ष तो उसी पर लगा रहा, लेकिन मोदी ने इसे चुनौती की तरह लिया। और अपनी सोची-समझी सक्रियता से चौतरफा मार का नक्शा बनाया। साहस और अविचलता को ब्रांड का केंद्रीय गुण बनाया और विरोधियों के हर हमले को लाभ के सामान में तब्दील कर लिया गया।

पहले ही दिन से मोदी और मोदी-विरोधी-दोनों अपने-अपने काम पर रहे हैं। पार्टी में भी और पार्टी के बाहर भी। गोवा की बैठक में मोदी का नाम प्रस्तावित करने का विरोध करके अयोध्या-रथी आडवाणी तक अद्भुत धर्मनिरपेक्ष हो गए थे। मोदी ने दिल्ली में कदम रखा तो संसद में प्रणाम से शुरू करके, विदेश यात्राओं तक, नवरात्र के ओबामा-नींबू-पानी से लेकर सऊदी अरब में मंदिर की जमीन तक, सर्जिकल स्ट्राइक से बालाकोट तक एक मोर्चे पर काम किया। साथ-साथ उज्ज्वला, स्वच्छता, पटेल, बोस, डिजिटल, आयुष्मान और आवास योजना की सब्सिडी के साथ जन-धन खातों समेत दूसरे मोर्चे पर काम किया। फिर नोटबंदी, जीएसटी से जूझते हुए राजनीतिक विरोधियों को अपनी गंगा आरती, विश्वनाथ पूजा और केदारनाथ से इस तरह निरस्त्र करने की कोशिश की कि उन्हें अपनी 'हिंदू पहचान' के सार्वजनिक मान से कोई संकोच क्यों होना चाहिए? इसका दूसरा अर्थ यह था कि जातियां तोड़ी जाएं, नए तंत्र का आत्मविश्वास खड़ा किया जाए, सांप्रदायिकता के भय का नैरेटिव बदला जाए और पारंपरिक समीकरणों को ध्वस्त करने में अपनी राजनीतिक शक्ति कैसे लगाई जाए? 'सवर्ण पिछड़ों' और 'मध्यमार्गी सवर्णों' का मिश्रण कैसे विश्लेषित किया जाए। क्षेत्रीय शक्ति की धुरी बनी खास जातियों की राजनीति को शेष अशक्त जातियों की राजनीति से कैसे निरस्त किया जाए? दूसरी तरफ वैचारिक मोर्चा यह था कि भीतर की ग्रंथियों, अतीत के भ्रष्ट शासन तथा अस्ताचलगामी विचारधाराओं का नैरेटिव कैसे तैयार किया जाए? फिर यह भी स्थापित होना चाहिए कि यह शंख ध्वनि से रोगाणु मारने वाला ठस परिहास-पात्र नहीं है, समकालीन शब्दावली से लैस ब्रांड है।

जवाब में एक पिछड़े, मामूली घर के, चौतरफा घेर लिए गए साहसी, सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े ब्रांड की एक कोर शक्ति यह स्थापित हुई कि वह बौद्धिक एलीट को चुनौती देता है। 'खान मार्केट' और 'लोधी गार्डन' इसीलिए गूंजे क्योंकि इससे सीधी स्थापना होती थी कि सत्ता के वे कथित संचालक जो पीछे रहकर दिल्ली से न्यूयॉर्क तक विमर्श खड़ा करते हैं, आमजन के ब्रांड को सहन नहीं करते, फिर भी वो खड़ा है तो इसीलिए कि आखिरी आदमी उसके साथ खड़ा है। वह आम जनता से शक्ति लेकर 'एलीट' को चुनौती देने का साहस रखता है। यह नए समय की ध्वनि को सुनना था। स्वातंत्रयोत्तर भारत में मध्य-वाम से मध्य-दक्षिण का सीधा साहसिक एलान करना था। साथ ही तकनीक, आधुनिकता और सांस्कृतिक वैभव का बिम्ब भी कौशलपूर्वक स्थापित किया जाना था। इसके अपने जोखिम थे जिन्हें कभी किसी ने नहीं उठाया था। नरेंद्र मोदी ने इसे उठाया और समांतर विमर्श की धारा खड़ी कर दी।

विपक्षी इसमें से सिर्फ कोई एक खास जाति और सिर्फ एक संप्रदाय का रचित भय ही संचित कोष की तरह लिए घूमते रहे। ऊपर से हुआ यह कि जनेऊ दिखाने, गोत्र बताने, गौपूजा करने या पीले दुपट्टे वाले कम्प्यूटर बाबाओं को 'भगवा आतंक'  के विरोध में फेरे लगवाने से बने प्रहसनों में अपना एक नैरेटिव ही स्वाहा कर दिया। जब कोई आपके भ्रष्ट आचरण या चालाकी  को पकड़ लेता है और आप अपने जवाब मे उसे जातिवादी या सांप्रदायिक हमले में रिड्यूस करने  लगते हैं तो वह मुहावरा ही कालांतर में शक्तिहीन होता चला जाता है। झूठ के प्रत्युत्तर में बड़ा झूठ, दोनों प्रहारों को स्वयमेव निरस्त कर देते हैं। यही वजह थी कि मोदी के प्रति क्रोध और नफरत में विरोधियों में इतना अंधत्व वरेण्य हो गया कि उसने उन्हें जमीनी सच से ही विरत कर दिया। इसी दौरान मोदी ने प्रहारों से अप्रभावित रहते हुए सांस्कृतिक अतीत से आधुनिक बिम्बों में तात्कालिक संदर्भों के साथ शक्ति संचित की और प्रतिपक्ष को छिन्न- भिन्न कर दिया।

नोटबंदी-जीएसटी अमीरों की चोरी के विरुद्ध गरीबों का नैरेटिव बन गए, मसूद अजहर स्वाभिमान और साहस का! आरती सांस्कृतिक वैभव का योग बन गई और मोबाइल की फ्लैश टॉर्च नई उम्र की नई फसल!

अब जब इस संश्लिष्ट जीत का सत्य दिखाई देने लगा है, तब भी इस ब्रांड से कुछ 'मासूम' वही आदिम सवाल कर रहे हैं, 'तो क्या अब हिंदू राष्ट्र, बनेगा?'

समझ जाइए। यदि अब भी ब्रांड मोदी के विरोधी उसकी शक्तियां समझ कर कारगर रणनीति बनाने के बजाय ऐसे जुबानी धिक्कार से ही काम चलाएंगे तो यह ब्रांड उससे आगे के नैरेटिव बनाएगा और फिर-फिर अपनी कोर-वैल्यू रिसाइकल करेगा।

तब तक, जब तक कि संबोधित और संबोधन के पारस्परिक संबंध ही नहीं बदल जाते!

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X