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परीक्षा की घड़ी है यह

Thu, 09 Apr 2015 07:36 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Thu, 09 Apr 2015 07:36 PM IST
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Test time for Pakistan

पाकिस्तान एक बार फिर बेहद मुश्किल हालात में पहुंच गया है, जहां एक गलत फैसला उसे ऐसे संकट में धकेल सकता है, जो उसका पैदा किया हुआ नहीं है। ऐसा पाकिस्तान के साथ पहले भी हो चुका है। पहले सोवियत कब्जे के दौरान, और फिर आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के अभियान के दौरान अफगानिस्तान में हस्तक्षेप की भारी कीमत उसने चुकाई है। मगर गनीमत है कि इस बार पाकिस्तान से सेना, लड़ाकू विमानों और युद्धक पोत भेजने की सऊदी अरब की गुजारिश और रियाद की ओर से लगातार डाले जा रहे दबाव के माहौल में नवाज शरीफ सरकार ने अंतिम फैसला संसद पर छोड़ दिया है। उन्होंने इस मामले में रजामंदी नहीं दी है।

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दरअसल, नई सऊदी सरकार यमन में हुथी विद्रोहियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए है, जबकि ईरान समेत सभी देश शांति और वार्ता के पक्ष में हैं। इस अनचाही स्थिति को समझना मुश्किल है, क्योंकि कबायली हुथी सऊदी अरब के लिए खतरा नहीं हैं। यह समझना भी जरूरी है कि किसी आजाद मुल्क पर सऊदी अरब का बम बरसाना गैरकानूनी है। खासकर तब, जब संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी अनुमति न दी हो। दिलचस्प है कि पाकिस्तान में संसद के भीतर से आ रही आवाजें, राजनीतिक दल, मीडिया और सिविल सोसाइटी, सब एक सुर में यमन में चल रहे संघर्ष में पाकिस्तानी सेना के शामिल होने का विरोध कर रहे हैं।
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दो समूह सऊदी अरब में पाक सैनिकों को भेजने का जोरदार ढंग से समर्थन कर रहे हैं। वे हैं- पंजाबी जेहादी ग्रुप और पाकिस्तान की हिंदू काउंसिल। जेहादी तो वैसे भी हमेशा लड़ाई की चाह रखते हैं, मगर हिंदू काउंसिल के समर्थन की आखिर क्या वजह हो सकती है? पाकिस्तानी हिंदू काउंसिल के प्रमुख और संसद सदस्य डॉ रमेश कुमार वेंकवानी ने नवाज शरीफ से अपने सैनिकों को यमन भेजने की गुजारिश की है। उनका तर्क है कि ईरान आहिस्ता-आहिस्ता अपना अख्तियार बढ़ा रहा है और अरब को डर है कि ईरान धीरे-धीरे दमिश्क, बगदाद, सना और कुछ हद तक बेरुत का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा। काफी हद तक यह स्पष्ट हो चुका है कि यमन में जो कुछ हो रहा है, वह शिया या सुन्नी की लड़ाई नहीं है। हालांकि यह भी सच है कि ईरान हुथी विद्रोहियों को फंड उपलब्ध करा रहा है। दरअसल, यह लड़ाई हुथी विद्रोहियों की है, ताकि वे सरकार से ज्यादा स्वायत्तता हासिल कर सकें। हुथी वे हैं, जिन्होंने कभी सऊदी अरब, काबा या मस्जिद-ए-नवाबी पर हमले का भय नहीं पैदा किया। सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना के भेजने से सैनिकों के भीतर भी समस्या उत्पन्न होगी। अगर संप्रदाय आधारित सोच को ऐसे ही बढ़ावा मिलता रहा, तो सैनिक भी खुद को बंटा हुआ महसूस करेंगे।
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इसके अलावा पाकिस्तान लगातार शिकायत भी करता रहा है कि नियंत्रण रेखा पर भारत की भड़काऊ गतिविधियों के चलते वह उत्तरी वजीरिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। अगर इस तर्क को मानें, तो पाकिस्तान अपने सैनिकों को सऊदी अरब कैसे भेज सकता है? यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सऊदी अरब ही था, जिसने इस्लाम की वहाबी विचारधारा को पाकिस्तान में फैलाया, जिसकी वजह से जेहादी समूहों को पनपने में मदद मिली। हाल ही में पाकिस्तान ने सऊदी अरब को दो-टूक लहजे में बता दिया कि पाकिस्तानी समूहों को उसके द्वारा दी जा रही आर्थिक मदद के चलते देश में आतंकी गतिविधियां बढ़ी हैं।

यह तर्क भी दिया जा रहा है कि अगर पाकिस्तान सऊदी अरब का साथ नहीं देगा, तो इससे दोनों मुल्कों के बीच के ऐतिहासिक और लंबे समय से चले आ रहे सामरिक रिश्तों को चोट पहुंचेगी। गौरतलब है कि सऊदी अरब ने कई मौकों पर पाक अर्थव्यवस्था को मदद दी है और देरी से भुगतान के बावजूद पाकिस्तान को ईंधन भी मुहैया कराया है। यही नहीं, हजारों पाकिस्तानी सऊदी अरब में काम करते हैं, जिनके भेजे गए पैसे से विदेशी विनिमय कोष की स्थिति सुदृढ़ बनाए रखने में मदद मिलती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब ने भारत से अपनी सेना यमन भेजने की गुजारिश क्यों नहीं की। बावजूद इसके कि सऊदी अरब में कार्यरत विदेशियों में सबसे ज्यादा तादाद भारतीयों की है। दरअसल, भारत सऊदी अरब की आर्थिक मदद का मोहताज नहीं है, इसीलिए उस पर सऊदी अरब की मदद का कोई दबाव भी नहीं है। दूसरी ओर, पाकिस्तान जानता है कि परमाणु वार्ता में हाल में मिली कामयाबी के बाद ईरान पर से अमेरिका और यूरोपीय संघ के आर्थिक प्रतिबंधों को जल्द ही हटा लिया जाएगा। इससे ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना पूरी होने में मदद मिलेगी। ऊर्जा संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए सस्ती गैस बोनस की तरह होगी। फिर जैसी कि शुरुआती परियोजना थी, अगर भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते सुधरते हैं, तो इसी पाइपलाइन को भारत में पंजाब तक बढ़ाया जा सकता है। यमन की लड़ाई में कूदने पर पड़ोसी ईरान से पाकिस्तान के रिश्ते खराब हो जाएंगे, जबकि सऊदी अरब हमारा पड़ोसी नहीं है।


पाकिस्तान के लिए बेहतर यह होगा कि सऊदी अरब को कुछ हद तक सैन्य मदद इस शर्त पर दी जाए कि पाक सेना यमन में प्रवेश नहीं करेगी। दूसरा सुझाव यह है कि सऊदी अरब की सुरक्षा के मामले में यह आश्वासन दिया जाए कि संकट की घड़ी में वहां की पवित्र भूमि की रक्षा के लिए पाकिस्तान अपनी सेना भेजने में तनिक भी देर नहीं लगाएगा। समझने वाली बात है कि अगर बमबारी ही सारे फसाद का समाधान होती, तो वर्षों तक इसे झेलने वाले तालिबान और अल-कायदा कब के खत्म हो चुके होते। सऊदी अरब को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जिससे विभिन्न आतंकी गुटों को यमन में जमीन बनाने में मदद मिले। आखिर अल कायदा वहां पहले से ही है।

-लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं

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