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विपक्षी एकता की परीक्षा

रशीद किदवई Updated Tue, 23 May 2017 01:08 PM IST
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रशीद किदवई
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आगामी राष्ट्रपति चुनाव हताश और कमजोर विपक्ष के सामने अवसरों की खिड़की खोलता दिख रहा है। सैद्धांतिक रूप से संयुक्त विपक्ष के पास राजग से ज्यादा वोट हैं। यह अलग बात है कि अन्नाद्रमुक, टीआरएस, वाइएसआर कांग्रेस, बीजद जैसी क्षेत्रीय और अन्य गैर-राजग दलों में विपक्ष को तोड़ने और नरेंद्र मोदी सरकार की मदद करने की क्षमता है।
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आगामी 25 जून को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुछ हद तक चूहे-बिल्ली का खेल शुरू हो गया है। एक चतुर राजनेता के रूप में सोनिया गांधी राष्ट्रपति चुनाव में सहज जीत सुनिश्चित करने के प्रति मोदी सरकार की उत्कंठा को भांप गई हैं। कथित तौर पर वह नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी और अन्य नेताओं के साथ करीबी संपर्क में हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विपक्ष की तरफ से कोई गलती न हो। सोनिया के नेतृत्व में विपक्ष चाहता है कि पहला कदम प्रधानमंत्री मोदी उठाएं। प्रणब मुखर्जी को दूसरा कार्यकाल देने से राजग सरकार का इन्कार विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि वह यह आरोप लगा सके कि मोदी सरकार ने आम सहमति का रास्ता नहीं अपनाया। विपक्षी नेता यह भी मान रहे हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए मोदी को सोनिया, येचुरी और ममता के साथ आम सहमति बनाने में कठिनाई होगी। प्रणब मुखर्जी के कद, अनुभव और उनके प्रति नवीन पटनायक एवं अन्नाद्रमुक नेतृत्व में सम्मान को देखते हुए संयुक्त विपक्ष चाहता है कि उन्हें दोबारा मौका मिले और ऐसा नहीं होने पर वह इसका दोष मोदी पर मढ़ेगा।


मोदी के प्रति निष्पक्ष रहते हुए कहें, तो यूपीए द्वारा मनोनीत और पूर्व कांग्रेसी मुखर्जी के नाम पर विचार करने की प्रधानमंत्री के सामने कोई बाध्यता नहीं है। डॉ राजेंद्र प्रसाद को छोड़कर अन्य किसी भी राष्ट्रपति को दूसरा कार्यकाल नहीं मिला है, हालांकि ज्यादातर राष्ट्रपति, जिनमें शंकर दयाल शर्मा, के आर नारायण एवं एपीजे अब्दुल कलाम ने लगभग खुले रूप से ऐसी आकांक्षा दर्शाई थी।

राष्ट्रपति चुनाव के साथ देश के राजनीतिक भाग्य को बदलने का इतिहास जुड़ा हुआ है। राष्ट्रपति भवन में संख्याबल की होड़ 1967 में शुरू हुई, जब संयुक्त विपक्ष ने संयुक्त विधायक दल के बैनर तले भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश के सुब्बाराव को प्रत्याशी बनाया। जस्टिस राव ने चर्चित गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का फैसला दिया था, जिसमें कहा था कि मौलिक अधिकारों को संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता।

इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने हिंदी पट्टी में नियंत्रण खो दिया था। उन्होंने सुब्बा राव का विरोध किया। वाम दलों और अन्य सहयोगियों के समर्थन से डॉ जाकिर हुसैन राष्ट्रपति चुने गए। राष्ट्रपति जाकिर हुसैन का तीन मई, 1969 को निधन हो गया। अगस्त 1969 में पार्टी नेतृत्व को खारिज करते हुए इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव में वीवी गिरी का समर्थन किया। कांग्रेस नेतृत्व ने आधिकारिक रूप से सभी सदस्यों को नीलम संजीव रेड्डी को वोट देने के लिए ह्वीप जारी किया। उधर इंदिरा गांधी ने सभी कांग्रेसी सांसदों एवं विधायकों से 'अंतरात्मा की आवाज' पर वोट करने की अपील की। वी वी गिरी चुनाव जीत गए। इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाल दिया गया। वह कांग्रेस संसदीय दल के 210 सदस्यों के साथ बाहर निकलीं और कांग्रेस दो फाड़ हो गई। तब से भारत के राष्ट्रपति का चुनाव पार्टी मुखिया और सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा किया जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संयुक्त विपक्ष जनता के बीच मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित है। विपक्षी दल यह भी समझते हैं कि यदि वे बंट गए, तो वे शीघ्र अप्रासंगिक हो जाएंगे। इसलिए गैर-भाजपा दलों को एकजुट कर संयुक्त संघर्ष का समानांतर प्रयास किया जा रहा है, जिसे वे सांविधानिक मूल्यों और उसकी बुनियादी संरचनाओं पर हमला बताते हैं।  इसलिए राष्ट्रपति चुनाव विपक्षी दलों के लिए यह देखने की पहली परीक्षा है कि वे एकजुट होकर भाजपा नीत राजग को 2019 के लोकसभा चुनाव में चुनौती दे सकते हैं या नहीं। और राष्ट्रपति चुनाव के दौरान प्राप्त अनुभव और समझ के आधार पर वे भाजपा के खिलाफ भावी चुनावी लड़ाई के लिए जमीन तैयार कर सकते हैं।

इलेक्टोरल कॉलेज की कुल क्षमता 10,98,882 है और राजग के पास अपने दम पर 5,31,442 वोट हैं, जो बहुमत के आंकड़े (5,49,442) से 18,000 वोट कम है। ऐसे में राजग को एक या सभी तीन गैर-राजग दलों-अन्नाद्रमुक, टीआरएस और बीजद से समर्थन हासिल करना होगा। राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को जीतने के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि न केवल गैर-भाजपा विपक्षी दल एकजुट रहें, बल्कि राजग के भी एक या दो सहयोगी उनके प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करें। इस चुनाव का नतीजा चाहे जो रहे, एक स्तर पर एकता की पूरी कवायद यह सुनिश्चित करने के लिए है कि मुख्य विपक्षी दलों के बीच व्यापक समझदारी है। यह भावी चुनावी संघर्ष के लिए लॉन्चिंग पैड साबित हो सकता है।

गौरतलब है कि आमने-सामने के किसी भी चुनावी संघर्ष में भाजपा को हराने के लिए विपक्षी दलों को सामर्थ्य हासिल करने की जरूरत है। सैद्धांतिक रूप से यह बिल्कुल संभव है कि मोदी के करिश्माई नेतृत्व में भाजपा को आमने-सामने की लड़ाई में हराया जा सकता है, लेकिन राजनीति सिर्फ संख्याबल का खेल नहीं है, बल्कि यह काफी हद तक धारणा की लड़ाई है, जहां भावनाएं, चुनावी रणनीति और कल्पनाशील वायदे अहम भूमिका निभाते हैं। सोनिया, ममता, येचुरी और अन्य नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि विपक्षी दलों के नेताओं के बीच समझौते से अलग विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं के बीच एकता और सद्भाव भाजपा की चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहद जरूरी है। जमीनी स्तर पर साझा संघर्ष और निर्वाचन क्षेत्रों के स्तर पर कामकाज में एकता विभिन्न पार्टी कार्यकर्ताओं (जो कई मामलों में एक-दूसरे के विरोधी होते हैं) के बीच एकजुटता और सद्भाव कायम करने के प्रभावी औजार हैं। ऐसा कहना बेशक आसान है, लेकिन करना कठिन।

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