फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Sweet smell of earthen pot and the love of water pot: Coolness of pot is not superstition, but pure science

मटके की सौंधी महक और लुटिया का प्रेम: मिट्टी के मटके की शीतलता कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शुद्ध विज्ञान

Sun, 24 May 2026 08:12 AM IST
Pavan जयदेव राठी
जयदेव राठी Published by: Pavan Updated Sun, 24 May 2026 08:12 AM IST
विज्ञापन
सार
मिट्टी के मटके की शीतलता कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शुद्ध विज्ञान है। मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों से जल की न्यूनतम मात्रा निरंतर वाष्पित होती है, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया द्वारा मटके का जल ठंडा बना रहता है।
loader
Sweet smell of earthen pot and the love of water pot: Coolness of pot is not superstition, but pure science
मटके की सौंधी महक और लुटिया का प्रेम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तीस-चालीस वर्ष पूर्व की गर्मी को याद कीजिए। ज्येष्ठ-आषाढ़ की तपती दुपहरी में जब सूरज आग उगलता था और सड़कें दहकती भट्टी-सी लगती थीं, तब नुक्कड़ों पर, पीपल-बरगद की छांव में, मंदिर के बाहर और गांव की चौपाल के पास एक दृश्य अवश्य दिखता था, मिट्टी के बड़े-बड़े मटके, उन पर गीला खद्दर का कपड़ा लिपटा हुआ और पास में बैठी कोई बूढ़ी अम्मा या सफेद धोती में कोई बाबा, हाथ में लुटिया लिए। जैसे ही कोई राहगीर पसीने से भीगा, हांफता हुआ आता, वह अम्मा उठ खड़ी होतीं और बिना किसी से कुछ मांगे, हाथों से पानी भरकर दे देतीं।


उस लुटिया में जो पानी होता था, वह केवल जल नहीं था। उसमें ममता, करुणा और एक अनजान इन्सान की थकान को दूर करने की अकुलाहट थी। मटके की मिट्टी की सौंधी खुशबू और उसकी प्राकृतिक शीतलता किसी भी आधुनिक रेफ्रिजरेटर को मात देती थी। लेकिन आज विडंबना है कि प्याऊ संस्कृति लगभग लुप्त हो चुकी है। वेदों के मंत्र से लोक-जीवन की बावड़ियों तक प्याऊ परंपरा भारतीय सभ्यता की गहन जड़ों से जुड़ी है। वेद काल से ही जल को जीवन का आधार माना गया है।


ऋग्वेद में उल्लेख है-
‘अपो हि ष्ठा मयोभुवः ता नः सर्वा प्रजावतीः।’
अर्थात, जल ही हमारा सुख है, वे सभी प्रजावान हों।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भी जल दान को सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है, जो मोक्ष का द्वार खोलता है। प्याऊ की परंपरा कोई कल की बात नहीं। राजस्थान में ‘पनघट’, हरियाणा में ‘बावड़ी’ और मारवाड़ में ‘प्याऊ’, ये सब उसी परंपरा के अलग-अलग रूप थे। बनिया समाज में तो बेटी की विदाई के समय या किसी स्वजन की पुण्यतिथि पर प्याऊ लगवाना सबसे बड़ा पुण्य कार्य माना जाता था। धर्मशाला और प्याऊ, ये दोनों तत्कालीन भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के अनौपचारिक स्तंभ थे। प्राचीन काल में तीर्थयात्रियों और व्यापारियों के लिए प्याऊ आवश्यक साधन थे। मध्यकाल में संतों और राजाओं ने इन्हें बढ़ावा दिया। जैन ग्रंथों में ‘पानी प्याऊ’ का वर्णन है, जहां अहिंसा के साथ जल सेवा जोड़ी गई। मुगल युग में भी यह प्रथा फली-फूली, क्योंकि तब यात्राएं लंबी होती थीं। स्वतंत्रता पूर्व ग्रामीण भारत में हर चौराहे पर मटके रखे जाते थे। वर्ष 1950 से 1970 के दशक तक यह एक आम दृश्य था।

आधुनिकता की आंधी और बाजार का सम्मोहन प्याऊ परंपरा को औद्योगीकरण और शहरीकरण ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया। वर्ष 1980 के बाद बोतलबंद पानी के आगमन ने इस पर अंतिम प्रहार किया। यद्यपि आजादी के बाद की योजनाओं में जल संरक्षण पर जोर था, किंतु व्यावसायिक हितों ने इस समृद्ध परंपरा को दबा दिया। एक अनुमान के अनुसार, आज बोतलबंद पानी उद्योग दो लाख करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। ब्रांडेड बोतलें सुविधा का नाम लेकर बिकती हैं, किंतु इनमें अक्सर प्लास्टिक में बंद बासी जल होता है। चालाक मार्केटिंग ने इसे एक ‘स्टेटस सिंबल’ बना दिया है,  ‘प्योर’ और ‘मिनरल’ के नाम पर। इस चमक-दमक के आगे प्याऊ के मटके को पुरातन और अस्वच्छ मान लिया गया। विभिन्न सर्वे बताते हैं कि 85 से 90 प्रतिशत पारंपरिक प्याऊ अब गायब हो चुके हैं।

सिमटती आत्मीयता, बिखरता पर्यावरण
प्याऊ संस्कृति के लुप्त होने के पीछे केवल समय का बदलाव नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। तेजी से हुए शहरीकरण ने सड़कें तो चौड़ी कर दीं, लेकिन चौराहों और सार्वजनिक स्थानों से मटके और प्याऊ गायब हो गए। आधुनिक जीवन में भौतिक जगह तो बढ़ी, पर मन का ठहराव और आपसी आत्मीयता कम होती चली गई। स्वास्थ्य को लेकर भी समाज में एक भ्रम फैलाया गया। बिना किसी ठोस प्रमाण के यह धारणा बना दी गई कि मटके या प्याऊ का पानी अस्वच्छ होता है, जबकि अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों में मिट्टी के घड़े के पानी को सबसे सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। डब्ल्यूएचओ से जुड़ी कई रिपोर्टों में भी पारंपरिक जल संग्रह प्रणालियों को बेहद उपयोगी बताया गया है। इस बदलाव का सबसे बड़ा नुकसान हमारे पर्यावरण ने उठाया है। हर वर्ष लाखों टन प्लास्टिक कचरा केवल पानी की बोतलों से पैदा हो रहा है। लेकिन अब जब जल संकट गहराता जा रहा है और भूजल का स्तर लगातार घट रहा है, तब इस परंपरा को फिर से जीवित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है।

इसके पीछे का विज्ञान
मिट्टी के मटके की शीतलता कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शुद्ध विज्ञान है। मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों से जल की न्यूनतम मात्रा निरंतर वाष्पित होती रहती है, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया द्वारा मटके के भीतर का जल प्राकृतिक रूप से ठंडा बना रहता है। यह प्रक्रिया बिना किसी बिजली, बिना किसी रसायन और बिना किसी प्लास्टिक के संपन्न होती है। मटके की मिट्टी स्वयं एक प्राकृतिक फिल्टर की भूमिका निभाती है। उस जल को तांबे या पीतल की लुटिया से पीने की परंपरा भी वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी थी, क्योंकि इन धातुओं के सूक्ष्म तत्व जल को रोगाणुरहित रखते थे। दूसरी ओर, आज जिस बोतलबंद पानी को हम ‘शुद्ध’ मानकर पी रहे हैं, उसकी असलियत बेहद चिंताजनक है। प्लास्टिक की बोतलों में बंद यह पानी कई बार महीनों पुराना होता है। तीव्र गर्मी में प्लास्टिक से निकलने वाले हानिकारक रासायनिक तत्व, विशेषकर बीपीए (बिसफेनॉल ए), उस जल में घुल जाते हैं और हमारे शरीर के हार्मोनल तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। जो पानी ‘मिनरल वाटर’ के नाम पर ऊंचे दामों में बिकता है, उसमें से अधिकांश कंपनियां सामान्य भूजल या नल के जल को ही केवल यंत्रों से शोधित करके पैक कर देती हैं, जिससे उसके प्राकृतिक खनिज भी नष्ट हो जाते हैं।

भावी पीढ़ी के लिए यक्ष प्रश्न
यह प्रश्न केवल पानी का नहीं, हमारी सामूहिक मानसिकता का है। क्या हम उस सहृदय सभ्यता की ओर लौट सकते हैं, जहां पड़ोसी की प्यास बुझाना अपना परम धर्म माना जाता था? इसका समाधान असंभव नहीं है। नगर निगम और पंचायतें यदि प्रमुख चौराहों पर स्वच्छ मटकों की व्यवस्था करें, सामाजिक संस्थाएं प्याऊ पुनर्जागरण अभियान चलाएं और स्कूलों में बच्चों को इस अनमोल परंपरा का महत्त्व समझाया जाए, तो शायद यह संस्कृति फिर से सांस ले सके।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed