फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Strom in cup of tea

चाय की प्याली में तूफान

Fri, 21 Feb 2014 07:42 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Fri, 21 Feb 2014 07:42 PM IST
विज्ञापन
Strom in cup of tea

चाय की प्याली में तूफान जैसा एक अंग्रेजी मुहावरा है, जिसका मतलब होता है वह बहादुरी या ज्ञान-चर्चा, जो उतनी देर ही चलती है, जितनी देर चाय की प्याली खत्म करने में लगती है! चाय खत्म बात खत्म! ऐसे क्रांतिकारियों से हमारी सुबह-शाम भरी रहती है- चाय का आखिरी घूंट लिया और क्रांति को सिट्ठी की तरह किनारे कर अपने मूल उद्योग में लगे! नरेंद्र मोदी की चाय की प्याली भी अब खाली हो चुकी है और भाजपा अपने मूल उद्योग में लग गई है-मिशन 270!

विज्ञापन


लेकिन मैं हिसाब यह लगा रहा हूं कि नरेंद्र मोदी ने चाय पर चर्चा कार्यक्रम में जो चाय बेची, उसकी प्रति प्याला क्या कीमत आई? सुनता हूं, मोदी कुशल प्रशासक हैं और यह भी खुला राज है कि देश की अधिकांश: कॉरपोरेट शक्ति उनके पीछे खड़ी है, जो हिसाब-किताब की बहुत पक्की होती है। तो इन दोनों से देश यह निवेदन तो कर ही सकता है कि हमें बताने की कृपा की जाए कि चाय पर चर्चा के इस आयोजन में, एक कप चाय की कीमत कितनी पड़ी? कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी चाय बेच-बेचकर ही बड़े हुए हैं और आज इस स्थिति में पहुंचे हैं कि देश को भी चाय की पुड़िया समझ कर बेचने में लगे हैं।
विज्ञापन


नरेंद्र मोदी देश के सबसे महंगे मुख्यमंत्री हैं-अपनी पोशाकों से लेकर अपनी सभाओं-रैलियों तक में! अपने प्रचार-प्रसार की खातिर उन्होंने जिस एजेंसी को भाड़े पर बुला रखा है, क्या कोई चायवाला वैसा करने की सोच सकता है? उनके आसपास कुछ भी वैसा क्यों नहीं होता, जो सामान्य हो, सादा हो, इस देश की मिट्टी से जुड़ता हो? वह कहीं गरज रहे थे कि आपने अब तक शासक चुना है, इस बार सेवक चुनिए; और ऐसा कहते हुए वह अपने सीने पर मुक्का भी ठोक रहे थे! क्या यह इस देश का सबसे घिसा-पिटा, अर्थहीन जुमला नहीं बन गया है? जो सेवा करने की शर्त यह रखता है कि उसे पहले सत्ता की कुर्सी दी जाए, और वह भी इस तरह दी जाए कि उसे किसी से वह सत्ता बांटनी न पड़े, वह सेवा का मतलब भी समझता है क्या? लेकिन राजनीति ऐसी ही सेवा करती आई है और देश ऐसे ही सेवकों से हलकान है। वह जो गांधी का अंतिम व्यक्ति है, वह किसी की भी चिंता में पहला नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


समझने का सवाल अगर कुछ है, तो यह है कि नरेंद्र मोदी कि राहुल गांधी कि मुलायम सिंह कि कोई और आगे आना चाहता है, तो क्यों? उसे आगे बढ़ाने वाली ताकतें कौन हैं, वह आगे आने की जोड़-तोड़ में किसे कुचल रहा है और किसे उठा रहा है? वह आगे आएगा, तो क्या करने की बात कह रहा है? उसने क्या आज तक ऐसा कुछ किया है, जिससे यह समझ में आता हो कि इसे भारत देश की हकीकतों का पता है? सीना 36 इंच का हो कि 56 इंच का, इसकी नाप फौज में काम की हो सकती है, लेकिन समाज में तो देखना यह पड़ता है कि उस सीने पर जख्म कितने हैं और किसके हैं!

गुजरात के सीने पर 2002 में लगा घाव सबसे ताजा है! यह जख्म लगा मोदी के शासन-काल में! वह उसकी जिम्मेदारी लेना तो दूर, उसके लिए माफी मांगने को भी तैयार नहीं हैं। वह और उनकी पार्टी तो जवाबी हमला करती है कि दिल्ली में सिख-विरोधी दंगों का अपराधी कौन है? दो अपराधी आपस में साठगांठ कर लें, तो क्या उससे अपराध न्याय में बदल जाता है? दिल्ली के उस शर्मनाक दंगों के लिए संसद में प्रधानमंत्री माफी मांग चुके हैं, अभी राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया कि कुछ कांग्रेसी उसमें शरीक थे, अदालत में उसके मुकदमे चल रहे हैं और उन कांग्रेसियों की जान सांसत में है, शक की सूई जिनकी तरफ घूमती रही है!

ऐसा कुछ भी गुजरात में क्यों नहीं हो रहा है? भाजपा वहां का मामला दबाने और दिल्ली का मामला उभारने में क्यों लगी है? क्या इतने दिनों बाद भी गुजरात में आम मुसलमान बेखौफ जी पा रहा है? जिस बात का इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि मुसलमानों का समर्थन मोदी को है, उसकी हकीकत यह है कि उन्होंने खामोशी ओढ़ ली है। वे जानते हैं कि यहां उनके संरक्षण में न तो व्यवस्था है और न उनकी सुनने वाला है कोई! पाकिस्तान में भी आखिर कुछ हिंदू तो रहते ही हैं न! लोकतांत्रिक समाज की पहली पहचान यही है कि वहां कोई भी बेखौफ रह सके। आप कह सकते हैं कि ऐसा देश में कहीं नहीं है। अपना यह दुर्भाग्य तो हम पहचानते हैं, पर गुजरात में इतना और जुड़ जाता है कि वहां का मुख्यमंत्री इसे मानने को तैयार नहीं है! और जिस गलती को मानते ही नहीं हैं, उसे ठीक करने की कोशिश क्यों करेंगे!

चाय पर चर्चा ही करने बैठे हैं, तो यह चर्चा भी क्यों न कर ली जाए कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश है कि 2002 दंगों से संबंधित जितने मामले मोदी व उनकी सरकार के खिलाफ चल रहे हैं, वे सभी गुजरात से बाहर चलाए जाएं, क्योंकि गुजरात में निष्पक्ष जांच की न्यूनतम संभावना भी नहीं है। यह गुजरात के लिए शर्मिंदगी का मामला है कि अभिमान का? हमने तो नहीं सुना या पढ़ा कभी कि मुख्यमंत्री ने गुजरात की इस छवि पर अफसोस जताया और यह संकल्प जाहिर किया हो कि वह इस छवि को बदलेंगे! इसके विपरीत हो यह रहा है कि गुजरात की छोटी अदालतें या जांच समितियां कुछ कह देती हैं, तो उसे इस तरह प्रचारित किया जाता है, मानो मोदी सारे आरोपों से बरी हो गए हैं।

चाय पर बातें करेंगे, तो बहुत-सी बातें आएंगी! मसलन, विकास के उन तमाम दावों की बात भी आएगी, जो मोदी के दावों में तो है, लेकिन गुजरात की हकीकत में नहीं है! लेकिन चाय की प्याली इतनी बड़ी तो होती नहीं है कि उसमें समंदर समा जाए! तो अगली प्याली तक इंतजार करते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed