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अजब दुरंगी दुनिया है: बचपन से बड़ी उम्र तक रहता है शिक्षा का प्रभाव, सही-गलत के फेर में न पड़ें...
Fri, 20 Dec 2024 05:07 AM IST
शुभम कुमार
धीरेंद्र वर्मा
धीरेंद्र वर्मा
Published by: शुभम कुमार
Updated Fri, 20 Dec 2024 05:07 AM IST
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सार
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अजब दुरंगी दुनिया
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अमर उजाला
विस्तार
सत्य क्या है, अथवा सबसे उत्तम मार्ग कौन-सा है, इसका निश्चय करना बहुत दुष्कर है। संसार में इतने धर्म हैं, इससे यही प्रकट होता है कि सत्य को जानना कितना कठिन है। एक ओर एक बूढ़ा मनुष्य जनेऊ पहने, माथे पर चंदन लगाए, स्नान करके, कुश के आसन पर बैठा गायत्री मंत्र का जाप कर रहा है। दूसरी ओर जूते और कपड़े पहने, गिरजाघर में खड़ा हुआ एक मनुष्य आंखें मूंदकर ईसा मसीह से पापों को दूर करने की प्रार्थना कर रहा है। तीसरी जगह मुल्ला साहब मस्जिद में घुटनों के बल बैठे हुए ‘या मुहम्मद रसूल अल्लाह’ को श्रद्धापूर्वक पढ़ रहे हैं। इसमें कौन ठीक है? ऐसा मालूम होता है कि दुनिया में सत्य और झूठ कुछ भी नहीं है, अथवा एक ही बात सच्ची और झूठी, दोनों हैं।जिन बातों को बचपन से सत्य और उत्तम कहकर बताया जाता है, उन्हें लोग अच्छा समझते हैं, और जिनको झूठ और खराब बताया जाता है, उन्हें बुरा समझते हैं। एक आदमी कच्चे मांस को देखकर घृणा के कारण मुंह फेर लेता है, और दूसरा मुंह में पानी भरकर टकटकी लगाकर उसी को देखता है। क्या यह शिक्षा का प्रभाव नहीं है। इनमें कौन ठीक है? कुछ विद्वानों ने सत्य और असत्य को जानने के लिए बहुत परिश्रम के बाद कुछ सिद्धांत रचे हैं। किंतु यह भी अलग-अलग हैं। एक कहता है कि जो आंखों से दिखाई दे, वह अवश्य है।
किंतु दूसरी ओर एक धुरंधर विद्वानों की मंडली कहती है कि जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह भ्रम मात्र है। हद हो गई! कैसे पता चले कि इनमें कौन ठीक है? एक आदमी ईश्वर को मानता है, दूसरा इस विचार की हंसी उड़ाता है। यह नहीं है कि देश अथवा काल के कारण यह कठिनाई पड़ती हो। एक ही घर में चार आदमी बिल्कुल अलग-अलग ख्याल के मिलेंगे। फिर पता कैसे चले कि इनमें ठीक कौन है? बचपन और बड़ी उम्र में सब से बड़ा भेद यह होता है कि पहली अवस्था में प्रत्येक बात कहानियों के अनुभव से जांची जाती है, तथा दूसरी अवस्था में संसार के प्रत्यक्ष और कठिन अनुभव से।
एक ऐसा समय आता है, जब पुराने सुख नए सुखों में धीरे-धीरे बदल जाते हैं। पढ़ने में एक विशेष आनंद आने लगता है। इसका कारण पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों के विषय नहीं होते, किंतु दर्जे में सबसे आगे बैठने या परीक्षाओं में सबसे अधिक नंबर फटकारने का शौक होता है। इस समय स्कूल जाने, और स्कूल से लौटकर स्कूल का ही काम करने में सब समय लग जाता है। कभी-कभी घर के बड़े लोगों को देश की दुर्दशा का वर्णन करते सुन दुख अवश्य होता है।
यह भी विचार उठते हैं कि मैं ही क्यों न देश का उद्धारकर्ता होऊं? स्कूल से निकलते ही एक नवीन संसार में प्रवेश करना होता है। प्रारंभ में यह संसार आशापूर्ण दिखाई पड़ता है, किंतु धीरे-धीरे ज्यों ही समय बीतता जाता है, संसार के असली स्वरूप का दर्शन होने लगता है। संसार की कठिन उलझनें व प्रत्यक्ष अनुभव कभी-कभी एक प्रकार की निराशा उत्पन्न कर देते हैं। किंतु यह शीघ्र ही दूर हो जाती है और फिर मनुष्य इस चक्र में खुशी-खुशी पड़ने को उद्यत हो जाता है। अंत में एक ही बात समझ आती है, अजब दुरंगी दुनिया है!
सूत्र- सही-गलत के फेर में न पड़ें
सही-गलत की परिभाषा के पीछे न भागें। जब तक जीवन है, तब तक सब के साथ प्रेम, स्नेह से रहें। अंत में, आपके जीवन के वर्ष मायने नहीं रखते, बल्कि आपका वर्षों में बिताया गया जीवन मायने रखता है। सर्दियों की गहराई में, आपके भीतर एक अजेय ग्रीष्म ऋतु छिपी हुई है। याद रखें, भविष्य उनका है, जो अपने सपनों की सुंदरता में विश्वास करते हैं।