एक सिस्टर की हत्या की कहानी, 28 साल बाद आखिर मिला इंसाफ
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- दबावों, प्रलोभनों के बावजूद कोट्टायम की एक 19 वर्षीय सिस्टर की हत्या के मामले में एक फादर और एक नन उम्रकैद की सजा से नहीं बच सके।
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विस्तार
अट्ठाइस साल पहले मार्च, 1992 में केरल के ईसाई मठ में एक सिस्टर अभया की हत्या के मामले में सीबीआई अदालत ने पादरी फादर थॉमस कोटूर और नन सिस्टर सेफी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोट्टायम के एक कॉन्वेंट से जुड़ी इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया था। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हुए अभया के माता-पता की मृत्यु तक हो गई। 27 मार्च, 1992 को कोट्टायम के पायस टेनथ कॉन्वेंट की 19 वर्षीय सिस्टर अभया का शव संदिग्ध हालत में एक कुएं से बरामद किया गया था। सिस्टर अभया ने फादर थॉमस कोटूर और एक नन सेफी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था। मगर कॉन्वेंट के अधिकारियों ने इसे आत्महत्या करार दिया। स्थानीय पुलिस की आरंभिक जांच रिपोर्ट पर सीजेएम अदालत ने संदेह जताया और यह मामला सीबीआई को सौंपा गया। मामले को खारिज करने के लिए कॉन्वेंट के विद्यार्थियों को प्रलोभन तक दिए गए। दबाव के आगे न झुकने के कारण जांच अधिकारी वर्गीस पी थॉमस को स्वेच्छा सेवानिवृत्ति तक लेने को मजबूर होना पड़ा।
इसके बाद जांच का जिम्मा संभालने वाले डीएसपी त्यागराजन को अचानक हटा दिया गया। उनके बाद आए जांच अधिकारी एम एल शर्मा ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अभया की मौत को आत्महत्या कहना ठीक नहीं, यह हत्या है। लेकिन उन्होंने लिखा कि सबूत न मिलने की स्थिति में जांच बंद की जाए। इसके बाद अभया के पिता थॉमस और मां लीला ने अदालत में याचिका दायर कर जांच समिति की रिपोर्ट को खारिज करने का आग्रह किया। उनकी याचिका पर अदालत ने आदेश जारी किया कि तीनों अपराधियों फादर थॉमस कोटूर, फादर जोस और सिस्टर सेफी का नारको टेस्ट करवाया जाए। यहीं से लगने लगा कि यह मामला अंजाम तक पहुंच जाएगा।
सिस्टर अभया 1992 में कोट्टायम के बीसीएम कॉलेज की छात्रा थी और आज वह जीवित होती तो करीब सैंतालीस वर्ष की होती। उन्होंने फादर थॉमस कोटूर और सिस्टर सेफी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था। कोटूर और सेफी को सलाखों के पीछे भिजवाने में एक चोर अदक्का राजू की अहम भूमिका थी। उसने अदालत को बताया था कि उसने जिस दिन अभया की हत्या हुई उस दिन सुबह चार-साढ़े चार बजे के दौरान कोटूर और सेफी को कॉन्वेंट की बिल्डिंग में देखा था। राजू चोरी के इरादे से आधी रात से इस बिल्डिंग में छिपा हुआ था। फैसला आने के बाद राजू ने बताया, 'पुलिस ने मुझ पर आरोप खुद पर लेने और कोटूर तथा सेफी के खिलाफ गवाही न देने के लिए दबाव डाला। यहां तक कि मुझे एक करोड़ रुपये का प्रलोभन भी दिया गया।' उसने कहा, मैं भी बेटियों का पिता हूं। अभया भी मेरे लिए बेटी के समान थी।...' इस मामले में जांच से शुरुआत में ही दबाव के आगे न झुककर इस्तीफा देने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी वर्गीस थॉमस ने कहा, 'मैंने सत्य के साथ खड़े होने का निर्णय लिया। मेरी दस वर्ष की नौकरी बाकी थी। मेरे सहयोगियों को बाद में पदोन्नतियां मिली। मुझे कोई अफसोस नहीं है।'
अभया की हत्या के मामले में घटनास्थल अहम है, क्योंकि इस कॉन्वेंट में पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। कोटूर यह साबित नहीं कर सके कि वह वहां क्यों गए थे। देरी से आने के बावजूद इस फैसले से न्याय को ताकत मिली है और अदालत पर लोगों का भरोसा बढ़ा है। इस फैसले ने दिखाया है कि अपराधी धर्म की आड़ लेकर नहीं बच सकते। फैसला सुनकर सेफी सिसकने लगी। फादर थॉमस कोटूर का चेहरा भावशून्य था। तिरुवनंतपुरम की जेल में उसे अब पादरी नहीं, बल्कि कैदी की पोशाक में रहना होगा। इसी तरह से सिस्टर सेफी भी अब नन की पोशाक नहीं पहन सकेगी। कोटूर और सेफी दोनों ने ही बीमारियों का हवाला देकर अदालत से रियायत मांगीं, लेकिन दोनों को आजावीन कारावास की सजा सुनाई गई है। कैथोलिक सभा के कुछ पदाधिकारियों ने संकेत दिए हैं के वे ऊपरी अदालत में इस फैसले को चुनौती देंगे। आज रवींद्रनाथ टैगोर की यह पंक्ति सार्थक लगती है, बादल कुछ समय तक सूर्य को ढंक सकता है, लेकिन उसे खत्म नहीं कर सकता।