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एनजीओ संस्कृति पर रोक लगाइए

Sun, 22 Feb 2015 11:50 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 22 Feb 2015 11:50 PM IST
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Stop this NGO culture

पिछली यूपीए सरकार में गैर सरकारी संस्थाओं को जितनी तवज्जो दी गई थी, उतनी कई सरकारी संगठनों को भी नहीं थी। एनजीओ किस्म के लोगों के कहने पर मनमोहन सरकार ने नए कानून बनाए, उनके कहने पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बंद हुईं, और उनके कहने पर नियम-नीतियों में बदलाव किए गए। उनका पूरा साथ दिया हम मीडिया वालों ने, और आज भी उनसे इतनी हमदर्दी रखते हैं कि हमने ग्रीनपीस की नायिका प्रिया पिल्लई से यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि मध्य प्रदेश सरकार की शिकायत करने वह लंदन क्यों जाना चाहती थीं। क्या हमारे सांसदों पर उनका इतना कम भरोसा था कि वह ब्रिटेन के सांसदों से भारतीय कंपनियों के खिलाफ शिकायत करने जा रही थीं?

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अपने देश की कानून-व्यवस्था को अगर इतना बेकार समझती हैं प्रिया पिल्लई, तो हमारी अदालतों के दरवाजे क्यों खटखटा रही हैं? मेरी राय में उन्हें लंदन जाने से रोकना गलत था। उन्हें रोककर ग्रीनपीस जैसी संस्था को, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के बहाने विकास को रोकने की कोशिश करती है, मोदी सरकार ने ज्यादा अहमियत दी है। ग्रीनपीस के कार्यकर्ताओं को रोकने से अच्छा होता कि सरकार इस संस्था को आने वाले पैसे और पर्यावरण को बचाने के पीछे इसके असली मकसद की जांच करती। अगर इस संस्था की नीयत साफ होती, तो हमारी प्रदूषित नदियों को साफ करने में यह क्यों नहीं मदद करती है? क्यों नहीं यह हमारे महानगरों में झुग्गी-बस्तियों को सुधारने के काम में मदद करती है? क्यों सिर्फ ऊर्जा पैदा करने की हर योजना पर इसका ध्यान रहता है? इनका बस चले, तो भारतवासी बिना बिजली के ही जीवन गुजारने पर मजबूर हो जाएंगे।
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उधर हैं तीस्ता सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद, जिन पर गबन का मुकदमा गुजरात उच्च न्यायालय में चल रहा है। गुलबर्ग सोसाइटी के कुछ लोगों ने मुकदमा दायर किया है, जिनका कहना है कि स्मारक बनाने के लिए जो पैसा इकट्ठा हुआ था, उसका तीस्ता और उनके पति ने निजी इस्तेमाल किया। मुकदमा अदालत में लड़ा जाना चाहिए, लेकिन तीस्ता जी को यह मंजूर नहीं, सो मीडिया की मदद से कहती फिर रही हैं कि मुकदमा झूठा है और राजनीतिक भी। इस मामले में न्याय करना अदालत का काम है, तो क्यों मीडिया का सहारा लेकर टीवी चैनलों के माध्यम से यह मुकदमा लड़ा जा रहा है?
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गैर सरकारी संगठन होने का मतलब होना चाहिए हर तरह से गैर सरकारी, मगर मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के दौरान ऐसे कई एनजीओ थे, जो गैर सरकारी न रहकर सरकारी बन गए थे। उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय से पैसा भी मिलता था। मोदी सरकार अगर पूरी तहकीकात करती है, तो संभव है कि कई गैर सरकारी संस्थाओं का एक ऐसा जाल सामने आएगा, जिसका एक ही मकसद था- कांग्रेस की राजनीतिक मदद गैर सरकारी तरीकों से करना। मोदी सरकार को असली देशसेवा करनी है, तो एक जांच आयोग बिठाने की वह तकलीफ करें, जो पूरे एनजीओ क्षेत्र की जांच करके रोशनी डाले इस क्षेत्र में उन संस्थाओं पर, जो भारत का विकास रोकने का काम कर रही हैं।

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