क्या अब भी मोदी का 'असली रूप' बाकी है
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चुनाव जब भी आते हैं, तो हम राजनीतिक पंडित इकट्ठा होते हैं टीवी चैनलों के स्टूडियो में अपने ज्ञान देने। घंटों तक इन अति ठंडे कमरों में बैठना होता है, इसलिए जब एंकर साहिब लेते हैं 'एक छोटा-सा ब्रेक', तो आपस में बहस करने का समय मिलता है। पिछले सप्ताह मैंने ऐसे ही कई घंटे महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजों का विश्लेषण करते गुजारे। इसका फायदा यह हुआ कि कई किस्म के वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत करने का मौका मिला। इनमें कुछ ऐसे थे, जो प्रधानमंत्री के प्रशंसक बन गए हैं, पर ज्यादातर ऐसे थे, जिनको अब भी मोदी 'असली रूप' दिखाएंगे। ऐसे लोगों का भ्रम दूर करना मुश्किल होता है, क्योंकि इनका नजरिया बंधा हुआ है वामपंथी विचारधारा के कट्टर ग्रंथों से, जो इनको किसी राजनीतिक या आर्थिक मसले को देखने की इजाजत नहीं देता।
जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो यही लोग इस पर सहमत थे कि 2002 की हिंसा का दाग उनके चेहरे पर इतना गहरा है कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में वह कदम रख ही नहीं पाएंगे। फिर जब लोकसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व में लड़ने का फैसला भाजपा ने लिया, तो इन्हीं लोगों ने कहना शुरू किया कि मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी जैसी छवि बनानी होगी, वरना भाजपा चुनाव हार जाएगी। जब छवि बदले बगैर पूर्ण बहुमत हासिल किया मोदी ने, तो ये लोग चुप रहे, पर जब उत्तर प्रदेश में 'लव जेहाद' का सिलसिला चला, तो ये फौरन सक्रिय हो गए।
महाराष्ट्र और हरियाणा में जीत के बाद मान गए हैं अब कि मोदी की लोकप्रियता बढ़ गई है प्रधानमंत्री बन जाने के बाद, लेकिन साथ-साथ शुरू हो गया है आलोचना का नया दौर। कहने लगे हैं लोग कि मोदी राजनीति में ही देश को उलझाकर रखना चाहते हैं, ताकि जनता न देख सके कि आर्थिक सुधार, जो अभी तक न के बराबर हुए हैं और न ही सुशासन के कोई ठोस आसार दिखना शुरू हुए हैं।
कहते हैं मोदी के दुश्मन कि आर्थिक सुधार लाने का उनका कभी इरादा था। उनका कहना है कि मोदी को आर्थिक मुद्दों की समझ ही नहीं है, इसलिए कुछ कर नहीं पाएंगे। मैंने जब उनको याद दिलाया कि अमेरिका के दौरे पर मोदी ने कितनी बार ऐसे भाषण दिए, जिनसे साबित हुआ कि वह भारत में ऐसा माहौल पैदा करने के लिए काम कर रहे हैं, जिसमें निवेशकों के लिए हर सुविधा हो। लेकिन दुश्मनी ऐसी है इन राजनीतिक पंडितों की मोदी के साथ कि वे ऐसी बातें सुनने को तैयार ही नहीं हैं। उनकी सोच यह है कि मोदी चूंकि आर्थिक तौर पर कुछ करने के काबिल नहीं हैं, निराशा फिर से फैल जाएगी देश में और उनकी सरकार कठिनाइयों से घिर जाएगी। इन पत्रकार बंधुओं की बातें सुनने के बाद एहसास हुआ मुझे कि मोदी के पास समय कितना थोड़ा है कुछ करके दिखाने के लिए। जल्द ही लेने होंगे उनको वे फैसले, जिनसे परिवर्तन और विकास की रफ्तार तेज हो जाए। निवेशकों को वापस लाने के लिए गलत कानूनों को खत्म करना होगा। देश में धन और रोजगार पैदा करने के लिए जल्दी शुरू करना पड़ेगा काम, ताकि इस देश के आम आदमी को भरोसा हो जाए कि बदलाव संभव है।
प्रधानमंत्री के असली समर्थक हैं इस देश के नौजवान, लेकिन जवानी अक्सर धीरज से वास्ता नहीं रखती। सो ध्यान देना होगा मोदी को इन गंभीर आर्थिक समस्याओं का हल ढूंढने पर। न सिर्फ उनके दुश्मन खड़े हैं, बल्कि उनके शुभचिंतक भी चाहते हैं कि अब मोदी करके दिखाएं वे चीजें, जिनका जिक्र किया है उन्होंने बार-बार। परिवर्तन और विकास लाना आसान नहीं होगा ऐसे देश में, जहां निराशा का माहौल छाया रहा है वर्षों से। इसलिए कहना गलत न होगा कि नरेंद्र मोदी की असली परीक्षाएं आर्थिक होंगी, राजनीतिक नहीं।