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पुलिस सुधार की दिशा में कदम

Tue, 19 May 2015 06:30 PM IST
शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Updated Tue, 19 May 2015 06:30 PM IST
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Step towards police reforms

दिल्ली में एक महिला के साथ यातायात पुलिसकर्मी द्वारा की गई घटना का संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी रोहणी एवं जस्टिस राजीव सहाय की पीठ ने कहा है कि यदि पुलिस के व्यवहार एवं कार्य प्रणाली में समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो राजधानी में शीघ्र ही जंगल राज कायम हो जाएगा। अदालत की यह टिप्पणी सिर्फ इस घटना पर आधारित नहीं है, बल्कि इस तरह की अन्य घटनाओं को ध्यान में रखकर की गई है। मसलन, हाल ही में दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में एक व्यक्ति को उसके दो छोट-छोटे बच्चों के सामने बड़ी बेरहमी के साथ पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी और बच्चों द्वारा गुहार लगाने के बावजूद पुलिस ने इस घटना को रोकने का प्रयास नहीं किया। अदालत की टिप्पणी को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार ने दिल्ली एवं देश के अन्य राज्यों के लिए परामर्श जारी करने की योजना बनाई है। इसमें पुलिस के लिए परामर्श होगा कि उसे जनता के साथ बेहतर व्यवहार करना चाहिए और संवेदनशील होना चाहिए।

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पुलिस राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था को लेकर सिर्फ परामर्श दे सकती है। गृह मंत्रालय की एक समिति ने भी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि यह आम धारणा बन गई है कि भारतीय पुलिस असंवेदनशील है। वह अब भी अंग्रेजों के समय से लागू पुलिस ऐक्ट से संचालित है, जिसे अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को कुचलकर भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए लागू किया था। इस कानून की मुख्य भावना ही यही है कि किस प्रकार जनता को डरा-धमका कर चुप रखा जाए। ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जब पुलिस का असंवेदन रवैया सामने आता है। सेवा और सहायता जैसे नारे का दम भरने वाली पुलिस इस इस स्थिति में कैसे पहुंची? समाज में फैली अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, राजनीति के अपराधीकरण, न्याय व्यवस्था के समयानुसार नहीं बदलने और न्याय में देरी होने और बढ़ते अपराध का असर भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर पड़ा है। इसके अलावा उसे भारी दबाव में भी काम करना पड़ता है। प्रदेश सरकारें उनकी नियुक्ति, तबादले और पदोन्नति इत्यादि पर पूर्ण नियंत्रण रखती हैं। इससे सत्ताधारी दल और उसका कैडर पुलिस को कानून के बजाय अपनी मर्जी से चलवाना चाहता है। रंगदारी, अपहरण, सुपारी देकर हत्या और रियल इस्टेट से संबंधित तमाम संगठित अपराध के पीछे यही गठजोड़ काम करने लगता है और पुलिस कई बार सब कुछ जानकर भी कार्रवाई नहीं कर पाती।
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केंद्र के परामर्श में पुलिस की कार्य कुशलता बढ़ाने के लिए सलाह दी जा रही है कि उसे संवाद कौशल और जवाबदेही विकसित करने का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। राज्य सरकारों को इसे सकारात्मक रूप में लेकर सार्थक कदम उठाने चाहिए। प्रदेश में जिला स्तर पर पुलिस के अंदर एक प्रशिक्षण विंग होनी चाहिए, जो समय-समय पर जिले के पुलिसकर्मियों को मानसिक एवं शारीरिक प्रशिक्षण दें। इसमें मनोवैज्ञानिकों को भी नियुक्त किया जाना चाहिए, जो जिले के कर्मियों की काउंसिलिंग भी कर सके। पहली बार केंद्र सरकार ने पुलिस सुधारों की तरफ कदम बढ़ाते हुए यह परामर्श जारी करने की सोची है।
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- लेखक भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्नल हैं

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