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पीठ में छुरा, बगल में छुरी
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एक होता है छुरा, जो यों तो लौकी, भिंडी और तरबूज इत्यादि सब्जियां काटने के काम आता है, लेकिन इस किस्म के घरेलू निरर्थक और गांधीवादी कामों से छुरे का दरअसल कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है, इससे तो सिर्फ उसकी धार ही भोथरी होती है।
घरेलू महिलाएं ऐसे भोथरे छुरों को तेज करवाने की मिन्नतें करती रहती हैं, और आज्ञाकारी पति प्रायः ऐसे छुरों के साथ उन दुकानों पर बरामद होते हैं, जहां छुरे की धार तेज की जाती है। यह छुरे के बहुआयामी व्यक्तित्व के साथ अन्याय है। छुरे का संपूर्ण और सार्थक व्यक्तित्व वस्तुत: उस समय निखरकर सामने आता है, जब वह पार्टी की पीठ में घोंपा जाए।
पार्टी की पीठ में घोंपते ही छुरे का राजनीतिकरण हो जाता है। फिर वह किचन से निकलकर सीधे अखबारों की सुर्खियों में आ जाता है और राजनीतिक हलकों में जोर-शोर से चर्चा होने लगती है कि फलाने जी ने पार्टी की पीठ में छुरा घोंप दिया। आम तौर से पार्टी की पीठ किसी को दिखाई नहीं देती।
पार्टी की पीठ का पता तभी चलता है, जब उसमें कोई छुरा घोंपता है। पार्टियों की यह फितरत होती है कि वे प्रायः अपनी पीठ दिखाना पसंद नहीं करतीं। कई बार तो चुनाव में सारे उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने पर भी वे अपनी पीठ नहीं दिखातीं। वे पीठ के बजाय अपने हाथों को लेकर ज्यादा फिक्रमंद रहती हैं।
पार्टी वाले अक्सर यह कहते हुए पाए जाते हैं कि पार्टी के हाथ मजबूत करें। इस बात से यह सिद्ध होता है कि राजनीतिक पार्टी के हाथ प्रायः कमजोर होते हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि पार्टियों के पांव भी होते हैं, क्योंकि कभी-कभी पार्टियां अपने किसी सदस्य से नाराज होने पर उसे लात मारकर बाहर निकाल देती हैं। बाद में ऐसी खबरें आती हैं कि अमुक जी को पार्टी ने लात मारकर निकाल दिया।
ऐसे मामले प्रायः संदेहास्पद होते हैं, क्योंकि पार्टी से निकलने वाले अमुक जी का कहना होता है कि पार्टी ने उसे लात नहीं मारी, वही पार्टी को लात मारकर बाहर हो गया। लेकिन बात छुरे की हो रही थी। उपयोगितावादी और परिवर्तनकामी दार्शनिकों का कहना है कि स्थान और परिस्थितियों के अनुसार छुरे में भी परिवर्तन होते रहते हैं।
मध्यवर्गीय परिवारों में पाया जाने वाला छुरा नाई के हाथों में जाते ही उस्तरा कहलाने लगता है। नाई का उस्तरा चेहरे के झाड़-झंखाड़ साफ कर लोगों को सभ्य बनाता है। चतुर लोग कई बार सामने वाले को उल्टे उस्तरे से भी मूंड देते हैं। उलटे उस्तरे से मूंडे गए व्यक्ति को लोग मूर्ख समझते हैं तथा उसकी पर्याप्त जग हंसाई होती है।
उस्तरे के साथ यह सतर्कता रखनी पड़ती है कि उसे बंदर के हाथ में न दिया जाए। बंदर के हाथ में उस्तरा आने पर वह खुद का और कई बार मदारी का भी गला नाप देता है। उस्तरे का यदि स्त्रीलिंग ढूंढा जाए, तो वह शब्दकोशों में भी नहीं मिलता, जबकि छुरे का स्त्रीलिंग छुरी कहलाता है।
छुरी को हाथ में रखने के बजाय बगल में रखने का विधान है। छुरी को बगल में रखने के पहले मुंह में राम रखना जरूरी है। अनुभवी लोग मुंह में राम रखने के बाद ही बगल में छुरी रखते हैं, जिससे उस मुहावरे को बल मिलता है, जिसमें कहा गया है कि मुंह में राम बगल में छुरी, खाते-पीते नीयत बुरी।
जीवन की गहरी मीमांसा करने वाले ज्ञानियों का कहना है कि मनुष्य का जीवन छुरे की धार की तरह दुर्गम और कठिन है। इसलिए उठो, जागो और ज्ञान प्राप्त करो। कठोपनिषद में कहा गया है, क्षुरस्य धारा दुरत्यया दुर्गम तत पथ। लेकिन कठोपनिषद सिर्फ आम आदमी के जीवन की बात करता है।
राजनीतिक लोगों का जीवन छुरे के बजाय दुधारी तलवार की तरह होता है। जैसे ही वे एक पार्टी की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उनके समक्ष दूसरी पार्टी में घुसने का रास्ता खुल जाता है। वे फौरन से पेश्तर दूसरी वाली पार्टी में घुसकर जन सेवा में जुट जाते हैं। लेकिन छुरे को साथ रखना कदापि नहीं भूलते। क्या पता, कब इसकी जरूरत पड़ जाए।
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घरेलू महिलाएं ऐसे भोथरे छुरों को तेज करवाने की मिन्नतें करती रहती हैं, और आज्ञाकारी पति प्रायः ऐसे छुरों के साथ उन दुकानों पर बरामद होते हैं, जहां छुरे की धार तेज की जाती है। यह छुरे के बहुआयामी व्यक्तित्व के साथ अन्याय है। छुरे का संपूर्ण और सार्थक व्यक्तित्व वस्तुत: उस समय निखरकर सामने आता है, जब वह पार्टी की पीठ में घोंपा जाए।
पार्टी की पीठ में घोंपते ही छुरे का राजनीतिकरण हो जाता है। फिर वह किचन से निकलकर सीधे अखबारों की सुर्खियों में आ जाता है और राजनीतिक हलकों में जोर-शोर से चर्चा होने लगती है कि फलाने जी ने पार्टी की पीठ में छुरा घोंप दिया। आम तौर से पार्टी की पीठ किसी को दिखाई नहीं देती।
पार्टी की पीठ का पता तभी चलता है, जब उसमें कोई छुरा घोंपता है। पार्टियों की यह फितरत होती है कि वे प्रायः अपनी पीठ दिखाना पसंद नहीं करतीं। कई बार तो चुनाव में सारे उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने पर भी वे अपनी पीठ नहीं दिखातीं। वे पीठ के बजाय अपने हाथों को लेकर ज्यादा फिक्रमंद रहती हैं।
पार्टी वाले अक्सर यह कहते हुए पाए जाते हैं कि पार्टी के हाथ मजबूत करें। इस बात से यह सिद्ध होता है कि राजनीतिक पार्टी के हाथ प्रायः कमजोर होते हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि पार्टियों के पांव भी होते हैं, क्योंकि कभी-कभी पार्टियां अपने किसी सदस्य से नाराज होने पर उसे लात मारकर बाहर निकाल देती हैं। बाद में ऐसी खबरें आती हैं कि अमुक जी को पार्टी ने लात मारकर निकाल दिया।
ऐसे मामले प्रायः संदेहास्पद होते हैं, क्योंकि पार्टी से निकलने वाले अमुक जी का कहना होता है कि पार्टी ने उसे लात नहीं मारी, वही पार्टी को लात मारकर बाहर हो गया। लेकिन बात छुरे की हो रही थी। उपयोगितावादी और परिवर्तनकामी दार्शनिकों का कहना है कि स्थान और परिस्थितियों के अनुसार छुरे में भी परिवर्तन होते रहते हैं।
मध्यवर्गीय परिवारों में पाया जाने वाला छुरा नाई के हाथों में जाते ही उस्तरा कहलाने लगता है। नाई का उस्तरा चेहरे के झाड़-झंखाड़ साफ कर लोगों को सभ्य बनाता है। चतुर लोग कई बार सामने वाले को उल्टे उस्तरे से भी मूंड देते हैं। उलटे उस्तरे से मूंडे गए व्यक्ति को लोग मूर्ख समझते हैं तथा उसकी पर्याप्त जग हंसाई होती है।
उस्तरे के साथ यह सतर्कता रखनी पड़ती है कि उसे बंदर के हाथ में न दिया जाए। बंदर के हाथ में उस्तरा आने पर वह खुद का और कई बार मदारी का भी गला नाप देता है। उस्तरे का यदि स्त्रीलिंग ढूंढा जाए, तो वह शब्दकोशों में भी नहीं मिलता, जबकि छुरे का स्त्रीलिंग छुरी कहलाता है।
छुरी को हाथ में रखने के बजाय बगल में रखने का विधान है। छुरी को बगल में रखने के पहले मुंह में राम रखना जरूरी है। अनुभवी लोग मुंह में राम रखने के बाद ही बगल में छुरी रखते हैं, जिससे उस मुहावरे को बल मिलता है, जिसमें कहा गया है कि मुंह में राम बगल में छुरी, खाते-पीते नीयत बुरी।
जीवन की गहरी मीमांसा करने वाले ज्ञानियों का कहना है कि मनुष्य का जीवन छुरे की धार की तरह दुर्गम और कठिन है। इसलिए उठो, जागो और ज्ञान प्राप्त करो। कठोपनिषद में कहा गया है, क्षुरस्य धारा दुरत्यया दुर्गम तत पथ। लेकिन कठोपनिषद सिर्फ आम आदमी के जीवन की बात करता है।
राजनीतिक लोगों का जीवन छुरे के बजाय दुधारी तलवार की तरह होता है। जैसे ही वे एक पार्टी की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उनके समक्ष दूसरी पार्टी में घुसने का रास्ता खुल जाता है। वे फौरन से पेश्तर दूसरी वाली पार्टी में घुसकर जन सेवा में जुट जाते हैं। लेकिन छुरे को साथ रखना कदापि नहीं भूलते। क्या पता, कब इसकी जरूरत पड़ जाए।