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कैसे बचेगा वसंत: जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ प्राकृतिक चक्र का हिस्सा नहीं, हम ही हैं इस मानवीय संकट के जिम्मेदार
Fri, 07 Feb 2025 04:30 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला
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Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Fri, 07 Feb 2025 04:30 AM IST
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यूरोप के जलवायु मॉनिटर कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की रिपोर्ट का यह दावा वाकई चौंकाने वाला है कि इस वर्ष का पहला महीना अब तक का सबसे गर्म जनवरी साबित हुआ है। यह स्थिति तब है, जब प्रशांत महासागर में ला नीना की स्थितियां विकसित हो रही हैं, जो आमतौर पर वैश्विक तापमान को कम करने का काम करती हैं। तापमान का इस तरह से बढ़ना हमें यह समझने पर मजबूर करता है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ प्राकृतिक चक्र का हिस्सा नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट बन चुका है, जिसके जिम्मेदार हम ही हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि जनवरी, 2025 का औसत वैश्विक तापमान औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से 1.7 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है, जो पेरिस समझौते में तय 1.5 डिग्री की सीमा को पार करने का एक और खतरनाक संकेत है। सामान्य दशाओं में मार्च व अप्रैल के महीने वसंत के माने जाते हैं, लेकिन अब जबकि फरवरी में ही अप्रैल वाले तापमान की स्थितियां पैदा हुई हैं, उसे और दुनिया भर के मौसम विज्ञानियों की आशंकाओं को देखते हुए यही महसूस होता है कि मौसमी बदलाव मौसम की प्रचलित परिभाषाओं को तेजी से बदल रहे हैं, जो वाकई चिंताजनक है।
इन बदलावों से पैदा हो रही समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या इसे समस्या न समझने वाला नजरिया है। पिछले साल जब हमने 1901 के बाद की तीसरी सबसे गर्म जनवरी देखी थी, तब भी काफी कुछ कहा और लिखा गया था, लेकिन इस वर्ष जनवरी ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए गलतियों से सबक न लेने की मनुष्य की प्रवृत्ति को ही उजागर किया है। वनों की कटाई, शहरीकरण, बढ़ता प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन वातावरण को तेजी से गर्म बना रहे हैं।
इसके अलावा, हिमनदों का पिघलना, समुद्र स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति भी हमें चेतावनी दे रही है कि जलवायु परिवर्तन दूरगामी समस्या नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। यदि हमें अपने ऋतुचक्र को संतुलित बनाए रखना है, तो जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेना होगा। पौधारोपण, हरित क्षेत्रों का संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सतत विकास की नीतियां अपनाकर ही इस संतुलन को पाया जा सकता है।
सरकार को जलवायु नीतियों को प्रभावी बनाना होगा, साथ ही आम नागरिकों को भी अपने स्तर पर जागरूक होकर योगदान देना होगा। जनवरी, 2025 की रिकॉर्ड तोड़ गर्मी यह याद दिलाने के लिए पर्याप्त है कि अगर हम अब भी नहीं जागे, तो हैरत नहीं कि ऋतुराज वसंत की आहट केवल कविताओं में ही सुनाई दे।