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तो सोनिया ही करेंगी अगुवाई?

Tue, 27 Aug 2013 07:29 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Tue, 27 Aug 2013 07:29 PM IST
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sonia will lead 2014 election for congress

कांग्रेस और उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए सोमवार का दिन वाकई अहम था, जब लोकसभा ने देर रात खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित कर दिया। बहस में हिस्सा लेते हुए उन्होंने कुछेक हिंदी शब्दों का गलत उच्चारण किया और कई बार उनके हाथ से कागज भी छूट गया, लेकिन कुल मिलाकर वह इस विधेयक को पारित करवाने में सफल रहीं।

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वह स्वाभाविक रूप से कुछ तनाव में थीं, इसलिए नहीं कि अमूमन उन्हें अच्छा वक्ता नहीं माना जाता, बल्कि इसलिए कि उनकी पार्टी सहित तमाम दलों के सांसदों की उन पर नजर थी। वह उस विषय पर बोल रही थीं, जिसके लिए वह निरंतर प्रयास करती रही हैं और कई बार तो उन्हें अपनी पार्टी और सहयोगी दलों के नेताओं के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ा, जिनमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और कृषि मंत्री शरद पवार तक शामिल रहे हैं।
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यदि बेबाकी से कहा जाए, तो 2009 में कांग्रेस के घोषणापत्र में शामिल होने के बावजूद खाद्य सुरक्षा विधेयक को इस मुकाम तक पहुंचने में इतना लंबा वक्त लगने की एक बड़ी वजह तो यही है कि यूपीए के भीतर ही इसका काफी विरोध था। मगर अंततः सोनिया गांधी इसे आगे बढ़ाने में सफल हुईं। भूख और कुपोषण को खत्म करने के वायदे के साथ यह विधेयक लाया गया है। उन्होंने अपने भाषण में दो टूक कहा, 'सवाल साधनों का नहीं है, हमें साधन जुटाने ही होंगे। सवाल यह नहीं है कि हम यह कर सकते हैं या नहीं, बल्कि हमें यह करना ही है।'
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आप सोनिया गांधी के इस दृष्टिकोण से सहमत या असहमत हो सकते हैं कि वैध तरीके से हक देकर ही लोगों को सशक्त बनाया जा सकता है। विपक्षी दल खामियां निकाल सकते हैं कि कांग्रेस के आर्थिक विकास के कारण ही, दो तिहाई लोग अब तक दो वक्त के भोजन से वंचित थे। यही नहीं, इस विधेयक पर पूरी तरह से अमल करना भी बड़ी चुनौती है। इसमें भी दो राय नहीं कि यह विधेयक और अच्छा हो सकता था, बशर्ते कि इसमें मुख्यमंत्रियों की भी सलाह ली जाती, जैसा कि मुलायम सिंह ने सुझाया। आखिर इस पर अमल की जिम्मेदारी राज्यों पर होगी।

इस विधेयक पर यूपीए के भीतर बीते चार वर्षों से जारी बहस ने हमारे लोकतंत्र की विसंगतियों और असहमतियों की गुंजाइश को उजागर किया। इसने प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के दृष्टिकोणों के सैद्धांतिक मतभेदों को भी प्रदर्शित किया है।

खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवाकर सोनिया गांधी ने कांग्रेस को एक बार फिर उसकी पारंपरिक मध्य से वाम की ओर झुकाव वाली छवि की ओर मोड़ दिया है। उसका जोर फिर से आम आदमी पर है। हाल के समय में सारा जोर विकास पर रहा है, चाहे वह जिस कीमत पर हो। लेकिन सोनिया ने इस सोच को बदलने का प्रयास किया। उन्होंने बताया कि यूपीए ने सूचना का अधिकार, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार और आदिवासियों को वन अधिकार देकर सशक्तीकरण किया है और खाद्य सुरक्षा का अधिकार इसी की अगली कड़ी है।

असल में बीते साढ़े चार वर्षों के दौरान यूपीए सरकार घोटालों और महंगाई बढ़ाने वाली सरकार के रूप में काफी बदनाम हो चुकी है। लेकिन सोनिया गांधी ने इस छवि को बदलने की कोशिश की। वास्तव में संसद में दिए गए उनके भाषण को उनकी पार्टी की तरफ से चुनाव अभियान की शुरुआत कहा जा सकता है।

तीन हफ्ते के शोर-शराबे के बाद आखिरकार यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया। हालांकि लोगों को संदेह था कि विपक्षी दल शायद इसे पारित न होने दें। यदि यह विधेयक मानसून सत्र के शुरुआती कुछ दिनों में पारित हो गया होता, तो इसे लेकर इतनी बहस नहीं होती और न ही कांग्रेस को इसका अपेक्षित लाभ मिलता।

खाद्य सुरक्षा विधेयक सोनिया गांधी के लिए भावनात्मक मुद्दा बन चुका था और जब दिनभर सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने के बाद सोमवार की रात तबीयत खराब होने पर उन्हें एम्स ले जाया गया, तब वह यह कहने से खुद को नहीं रोक सकीं कि इस विधेयक पर मतदान के समय वह सदन में नहीं हैं। इसका भी भावनात्मक असर हुआ।

वाकई सोमवार का दिन सोनिया गांधी की 15 वर्षों की राजनीतिक यात्रा का अहम पड़ाव है। अपनी तमाम कमजोरियों के बाद भी, मसलन वह देश के बड़े राज्यों में पार्टी को पुनर्जीवित नहीं कर सकी हैं, और खाद्य सुरक्षा विधेयक जैसे कुछ मौकों को छोड़ दें, तो अमूमन वह पार्टी का एजेंडा तय करने में उतनी सक्रिय भी नहीं रहीं, आज कांग्रेस का वही सबसे विश्वसनीय चेहरा हैं। मायावती, ममता बनर्जी और करुणानिधि जैसे क्षेत्रीय नेताओं से उनके ताल्लुकात उनकी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से कहीं बेहतर हैं।

यह मानना नादानी ही होगी कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को जब वह 'गेम चेंजर' बता रही थीं, तो उनके मन में इसका राजनीतिक और चुनावी लाभ उठाने की मंशा नहीं रही होगी। मगर सवाल है कि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को इसका कितना राजनीतिक लाभांश मिल पाएगा? चूंकि गैर कांग्रेसी सरकारें लाभार्थियों की शिनाख्त करने के नाम पर वक्त ले सकती हैं, इसलिए लगता नहीं कि यूपीए-एक के समय जिस तरह से कर्जमाफी और मनरेगा का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचा था, वैसा अभी कुछ होगा।


इसके अलावा लोग भी यूपीए के दस वर्षों के शासन के दौरान हुए घोटालों और महंगाई को लेकर संशय में हैं। खाद्य सुरक्षा को आधार कार्ड से जोड़ने से कुछ माहौल जरूर बन सकता है। वास्तव में सोमवार को एक और बात स्पष्ट हो गई कि 2014 में नरेंद्र मोदी से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास यही विकल्प है कि सोनिया गांधी ही अगुवाई करें। मगर क्या स्वास्थ्य उन्हें इस बात की इजाजत देगा?

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