अब तक छियालीस
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तबादलों के अनुभवी अशोक खेमका का यह छियालीसवां तबादला है। है न कमाल की बात! सेवा बाईस साल की और तबादले पूरे छियालीस। यानी साल में दो से जरा ऊपर तबादले। वर्ल्ड रिकॉर्ड तो पक्का नहीं कह सकते, पर अपने आप में रिकॉर्ड जरूर है। पता नहीं, प्रधानमंत्री जी इसे कैसे मिस कर गए? जरूर खेमका के छियालीसवें तबादले के मौके पर हरियाणा में खट्टर सरकार की मौजूदगी ने प्रधानमंत्री के हाथ बांध दिए होंगे। वर्ना वह तो कोई छोटे से छोटा रिकॉर्ड बनने पर भी अपनी बधाई ट्वीट करना नहीं भूलते। वह इस रिकॉर्ड का श्रेय लेने का दावा कर सकते थे। आखिर यह रिकॉर्ड कायम तो उनके राज में ही हुआ है।
पर खेमका का परिवहन से पुरातत्व में तबादला किए जाने पर ही इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है? इससे पहले पुरातत्व से परिवहन में खेमका का पैंतालीसवां तबादला भी तो खट्टर सरकार ने ही किया था। सरकार पुरातत्व से परिवहन में ले जाए, तो ठीक, परिवहन से पुरातत्व में ले जाए, तो ज्यादती, यह कहां का इंसाफ है भाई। अरे सिंपल-सी बात है। खेमका का स्पेशलाइजेशन रोकने में है। परिवहन विभाग में रोकने वाले का क्या काम? रोकने वालों के लिए पुरातत्व ही ठीक है। सदियों से रुकी पड़ी चीजों के मामले में दस-पांच साल की रोक से भला क्या फर्क पड़ेगा?
कुछ लोग बेवजह ही यह सवाल उठा रहे हैं कि वाड्रा मामले में पंगा लेने के लिए जो खेमका हीरो नजर आ रहे थे, वह अब खाकी भाइयों की नजरों में जीरो कैसे हो गए? वाड्रा से पंगा लेने के लिए तबादला हो, तो हीरो और खनन माफिया से पंगा लेने के लिए तबादला हो, तो जीरो-यह तबादले पर पॉलिटिक्स करना नहीं, तो और क्या है? तबादला तो तबादला है। सरकार में जो भी होगा, वह छठे-छमाहे खेमका का तबादला तो करेगा ही। खट्टर सरकार का कोई कुसूर है, तो सिर्फ यही कि वह हुड्डा जैसी सरकार साबित हुई है। इसके बावजूद यह उम्मीद करनी चाहिए कि खेमका जी के तबादले की हाफ सेंचुरी की खबर जल्दी ही सुनने को मिलेगी।