फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Side effects Time for memory loss No cloud technology can preserve memories of creation

दुष्प्रभाव: सुधियों के विलोप का समय... कोई भी क्लाउड तकनीकी सृजन की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का साधन नहीं...

Tue, 26 Nov 2024 03:52 AM IST
मनोज मिश्र मनोज मिश्र
Updated Tue, 26 Nov 2024 03:52 AM IST
विज्ञापन
सार
हजारों साल की विकास यात्रा में जो गुण अर्जित किए, वे 30 सेकंड की रील के जमाने में कितनी तेजी से क्षरित हो रहे हैं, इसका हमें अंदाजा भी नहीं है।
loader
Side effects Time for memory loss No cloud technology can preserve memories of creation
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

साहित्यकारों से खतों-किताब की अभ्यस्त पुरानी पीढ़ी के लोगों की फाइलों में बच्चन जी के पत्रों की यह इबारत आज भी मिल जाएगी-‘प के लिए ध।’ ‘पत्र के लिए धन्यवाद’ के संक्षिप्तीकरण की इस शैली का हरिवंश राय बच्चन ने कई दशक पहले जब श्रीगणेश किया था, तब शायद उन्होंने ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले दिनों में यह विशिष्ट किस्म की भाषा बन जाएगी।



कुछ बरस पहले जब फोन में एसएमएस की सुविधा आई, तो लोगों ने अनायास ही इसे अपनाना शुरू किया। व्हाट्सएप आने के बाद यह और विकसित हुई। इस दौर में लिखे हुए शब्दों की जगह फोन में पहले से उपलब्ध नाना प्रकार की इमोजी ने ले ली। हंसना, मुस्कराना, प्यार जताना या फिर किसी को चिढ़ाना, हर किस्म की इमोजी उपलब्ध है। कुछ कहने के लिए शब्दों के चयन की जहमत उठाने की जरूरत ही नहीं रह गई। आज रील्स की हाहाकारी दुनिया ने तो अभिव्यक्ति की इस फटाफट शैली को नए आयाम दे दिए हैं।


ज्यादा घातक बात यह है कि रील्स के नशे के शिकार 15 से 35 साल के युवा ज्यादा हो रहे हैं। डायरेक्ट साइंस मैग्जीन और हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू  जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में हाल ही में प्रकाशित अध्ययनों में विशेषज्ञों ने अवसाद, अकेलेपन और व्यूज न मिलने पर उपजी गहरी निराशा को लेकर तो चिंता जताई ही है, यहां तक कह दिया कि ये मनोविकार वर्चुअल ऑर्टिज्म का कारण बन रहे हैं। दुर्भाग्य से यह सब अब हमें बेहद सुविधाजनक और सामान्य लगने लगा है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि बिना किसी मानसिक श्रम के संदेश भेजने या झटपट कुछ नया रच देने के चक्कर में हम क्या-क्या खोते चले जा रहे हैं।

मनुष्य ने ध्वनियों से अक्षरों और अक्षरों से शब्दों की यात्रा ऐसे ही नहीं पूरी की है। इसके पीछे उसका हजारों साल का अथक परिश्रम है। पीछे पलटकर देखें, तो गुफाचित्र मनुष्य की अपनी कहानी कहने की इसी बेचैनी को उजागर करते हैं। जाहिर है, इस बेचैनी को रास्ता आसानी से नहीं मिला होगा। विभिन्न प्रकार की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए, अलग-अलग ध्वनियां विकसित करने के लिए हमारे पुरखों ने न जाने कितने उपक्रम किए होंगे। और इस क्रम में मनुष्य ने भाषा ही नहीं, और भी बहुत कुछ सीखा। मानसिक स्थिरता और धैर्य जैसे गुण उसे भाषा अर्जित करने की इसी विकास यात्रा में हासिल हुए होंगे। शिकार पर निशाना लगाने और भावना की सटीक अभिव्यक्ति के लिए शब्द के चयन में समान एकाग्रता की जरूरत मनुष्य को पड़ी होगी। बाद में इन्हीं गुणों ने कलाओं के विकास से लेकर विभिन्न प्रकार के आविष्कार तक में अहम भूमिका निभाई।

लेकिन हजारों साल की विकास यात्रा में हमने जो गुण अर्जित किए, वे 30 सेकंड की रील के इस जमाने में कितनी तेजी से क्षरित हो रहे हैं, इसका शायद हमें एहसास भी नहीं है। रील एक किस्म का नशा तो है ही, हमारी चेतना की बुनियादी संरचना पर चोट भी है। हमें इसकी कोई फिक्र नहीं है कि इस वजह से हम आने वाले दौर में क्या-क्या गंवाने जा रहे हैं। कहानी सुनाना इन्सान की बुनियादी प्रवृत्ति है। कहानी के बहाने इन्सान अपनी पूरी यात्रा अगली पीढ़ी को सौंपता है। क्या यह माना जा सकता है कि जिस पीढ़ी में 30 सेंकेड से ज्यादा कुछ सुनने-देखने का धैर्य नहीं बचा है, वह गंभीर सिनेमा, साहित्य या संगीत में दिलचस्पी लेगी? क्या टॉल्स्टॉय के युद्ध और शांति तथा दोस्तोवस्की के अपराध और दंड जैसे मोटे व उत्कृष्ट उपन्यास पढ़ने का धीरज उसके पास होगा? क्या प्रेमचंद के गोदान और रेणु के मैला आंचल जैसे कालजयी उपन्यासों के लिए इस दौर में कोई जगह है? यह मानकर चलना कि भीमसेन जोशी और कुमार गंधर्व के लंबे आलाप युवा पीढ़ी की सुरुचियों में सहायक बनेंगे, उन्हें भीतर से परिष्कृत और सुसंस्कृत करेंगे, खामख्याली से ज्यादा कुछ भी नहीं लगता।

सोचकर देखिए, तो डर लगता है, भित्तिचित्रों और महाकाव्यों से होती हुई जो स्मृतियां हम तक पहुंची हैं, उनके आगे जाने का कोई रास्ता नहीं बचा है। स्मृतियां सिर्फ व्यक्तिगत नहीं होतीं। वे सामाजिक और सामूहिक, दोनों स्तरों पर मनुष्यता को समृद्ध करती हैं। यह कह देना बेमानी है कि तकनीकी बदलाव अपरिहार्य है, इसे स्वीकार किया ही जाना चाहिए। माना कि डिजिटल लॉकर में बहुत कुछ सुरक्षित रखा जा सकता है। क्लाउड मेमोरी में अनंत स्पेस होता है, लिहाजा स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए संसाधन की कोई कमी नहीं है। लेकिन जब सृजन का धीरज ही नहीं बचेगा, तो क्या सृजन होगा और क्या डिजिटल लॉकर में सुरक्षित रखा जाएगा? कोई भी क्लाउड तकनीकी सृजन की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का साधन नहीं हो सकती। यह स्मृतियों के विलोप का समय है और हम सब इसे ऐसे ही स्वीकार करने के लिए अभिशप्त हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed