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बच्चे नहीं जानते
शिवशरण बंधु
Updated Sat, 24 Jan 2015 09:02 PM IST
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बच्चों की रंग-बिरंगी
कतारें
जैसे, उड़ रहे हों गुब्बारे
हवा में।
पहली कतार-
हाथों में त्रिशूल
दूसरी कतार-
हाथों में तलवार
तीसरी कतार-
धनुष-बाण
कस्बे की मुख्य सड़क पर
युद्ध की विभीषिका से बेखबर
बच्चे
युद्ध का अभ्यास कर रहे हैं
युद्ध, जो अपने ही आंगन में
अपनों के ही खिलाफ
लड़ा जाएगा
बच्चे नहीं जानते।
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एक दिन
अंधेरों से लड़ते-लड़ते,
एक दिन बन जाऊंगा सूरज।
खोदते-खोदते जमीन,
एक दिन बन जाऊंगा नदी।
फैलते-फैलते एक दिन,
बन जाऊंगा आकाश
और सोचते-सोचते एक दिन,
बन जाऊंगा आदमी।