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सेवा या सत्ता की चाहत

Tue, 23 Aug 2016 06:35 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Tue, 23 Aug 2016 06:35 PM IST
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Service or seeking power
सुरेंद्र कुमार

हर वर्ग के सिविल सेवकों को व्यंग्यात्मक ढंग से मीडिया बाबू कहता है, जो पूरी तरह से अनुचित है। वे निश्चित रूप से ब्रिटिश राज के क्लर्क नहीं हैं, जो मशीनीकृत तरीके से दस्तावेज टाइप करके फाइल दाखिल करते थे और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी नहीं होती थी। इसके विपरीत स्वतंत्र भारत में सिविल सेवक नीति निर्माण पर नियंत्रण रखते हैं और भारी शक्ति का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें हमारे जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश को एकजुट बनाए रखने के लिए प्रशासनिक निरंतरता और ढांचा प्रदान किया गया है और उन्होंने अपनी बदलती भूमिकाओं के साथ कुछ सफलताएं हासिल की हैं। लेकिन नौकरशाही की देरी, लालफीताशाही, नए विचारों का विरोध, राजनीतिकरण और राजनीतिक व्यवस्था द्वारा अपने दुरुपयोग की अनुमति देने के लिए उन्होंने काफी बदनामी भी अर्जित की है। अफसोस कि वे अक्सर सत्तारूढ़ पार्टी और अपने राजनीतिक आकाओं की इच्छाओं के अनुसार अपनी सलाह देते हैं। इस अपवित्र गठजोड़ में लोक सेवा के विचार का पूरी तरह से नुकसान होता है। जब प्रधानमंत्री खुद को प्रधानसेवक बताते हैं, तो भी ज्यादातर सिविल सेवक खुद को सरकारी सेवक के बजाय अधिकारी मानते हैं। यह मानसिकता उस जनता के प्रति उनके रवैये और व्यवहार को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है, जिसकी सेवा करने के लिए वे हैं।

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साल भर चलने वाली त्रिस्तरीय चयन प्रक्रिया के तहत संघ लोकसेवा आयोग द्वारा करीब 1,100 सिविल सेवकों की नियुक्ति की जाती है। यह देश की सबसे कठिन प्रतियोगिताओं में से एक है। हैरानी की बात है कि देश में सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बैंकों और निजी क्षेत्र की भारतीय कंपनियों के प्रवेश के बावजूद आईएएस, आईपीएस और आईआरएस सेवा का लालच कम नहीं हुआ है। हालांकि सभी उम्मीदवार यही तोतारटंत जवाब देते हैं कि वे जनता की सेवा करने के लिए सिविल सेवा में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन यह सत्ता, अधिकार और सामाजिक प्रतिष्ठा की भावना ही है, जो युवाओं को सिविल सेवा से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है।
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वर्ष 1991 से भारत की जीडीपी में कई गुना वृद्धि हुई है, विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ा है और भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अरबपतियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। आईटी सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत परोक्ष रूप से महाशक्ति बन गया है। करीब 15 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया गया है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है! लेकिन अब भी हमारे यहां बड़ी संख्या में लोग निरक्षर और गरीब हैं और दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे यहीं हैं। मानव विकास सूचकांक, आश्रय, शिक्षा, पेयजल, स्वास्थ्य और स्वच्छता के मामले में हमारी गिनती उप-सहारा देशों के साथ की जाती है। करोड़ों लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए एक डॉलर से भी कम कमाते हैं। बेशक हमने व्यवसाय को आसान बनाने और इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में कुछ प्रगति की है, लेकिन अभी हमें मीलों चलना है। इसके साथ ही भारत का मध्यवर्ग, जो तेजी से उभरते शॉपिंग माल्स पर भीड़ लगाए रहता है और सोशल नेटवर्किंग साइट पर लगातार सक्रिय रहता है, बहुत अधीर है। उसकी आकांक्षाओं का विस्फोट हो रहा है।
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जाहिर है, आज शासन सिर्फ कानून-व्यवस्था बहाल रखने और कर वसूलने तक सीमित नहीं रह गया है। इसे अब आर्थिक विकास, ग्रामीण एवं शहरी आवास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, जल प्रबंधन, स्वच्छता, हरित ऊर्जा, स्वच्छ वातावरण पर ध्यान केंद्रित करना होगा और सामाजिक व धार्मिक तनाव, कमजोर वर्गों व महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों, अतिरिक्त न्यायिक निकायों, स्वयंभू सामाजिक ठेकेदारों, बढ़ते भ्रष्टाचार और राजनीतिक वर्ग से उनके पक्ष में फैसला लेने या गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी वाले दबावों से निपटना होगा। कई क्षेत्रों में लचर प्रशासन आम आदमी को असहाय, क्रोधी, निराश और निंदक बना देता है, वह खुद को देश की प्रगति से अलग-थलग महसूस करता है।

सिविल सेवकों की भर्ती की मौजूदा प्रणाली पूरी तरह से अंकों पर निर्भर है, लेकिन क्या अंक किसी की सच्ची योग्यता के बराबर हो सकता है? क्या मौजूदा यूपीएससी परीक्षा उम्मीदवारों की ईमानदारी, निष्ठा, दृढ़ निश्चय, राजनीतिक दबाव के आगे खड़े होने की मानसिक शक्ति, हर परिस्थिति में सही करने की प्रतिबद्धता, लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता और वंचित लोगों के प्रति सहानुभूति का आकलन कर सकती है? यह कैसे साबित होगा कि प्रतिभा सूची में अव्वल आने वाले के पास वह नैतिक शक्ति है कि वह धन-बल का सहारा लेने वालों से टक्कर ले सकता है और अपने उच्चाधिकारियों के गलत आदेश को ठुकरा सकता है? क्या एक सफल उम्मीदवार, जो जीवन में सभी अच्छी चीजों का शौकीन है, लेकिन गरीब और जरूरतमंदों के प्रति उदासीन है और अपने आकाओं और प्रभावी लोगों को खुश करने के लिए कानून तोड़ सकता है, प्रभावी और ईमानदार प्रशासक हो सकता है?

जम्मू-कश्मीर के गवर्नर एन एन वोहरा अपनी पुस्तक सेफगार्डिंग इंडिया में कहते हैं-सतत कुशासन और भ्रष्टाचार ने यह धारणा बनाई है कि हमारी राजनीति, नौकरशाही और समृद्ध व प्रभावशाली लोग कानून से परे हैं। पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह मानते हैं कि कई सिविल सेवक न केवल सांप्रदायिक, बल्कि जातिवादी बन गए हैं। हाल ही में हरियाणा में हुए जाट आंदोलन के दौरान हुए दंगों पर अपनी घातक रिपोर्ट में उन्होंने कहा है कि वहां दो दिन तक हरियाणा सरकार पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी, कानून के रक्षकों ने घटनाएं होने दीं। वित्तीय गबन के आरोप में घिरे आईएएस और आईपीएस की संख्या बढ़ रही है। जिलाधिकारियों की उदासीनता के कारण दलितों, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ रोज बर्बरता हो रही है।


यूपीएससी को उम्मीदवारों में अंतर्निहित ताकत के आकलन के तरीकों पर विचार करना चाहिए, ताकि वे साफ-सुथरी, त्वरित, प्रभावी और लोक हितैषी प्रशासन दे सकें। एक बोर्ड द्वारा लंबा व्यक्तित्व परीक्षण होना चाहिए, जिसमें एक मनोविश्लेषक, एक समाज वैज्ञानिक और नागरिक समाज और मीडिया से एक-एक प्रतिनिधि अवश्य होना चाहिए। किताबी ज्ञान के बजाय सवाल आज की समस्याओं से निपटने की क्षमता पर आधारित होने चाहिए।

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