रात में काम से लौटती महिलाओं की सुरक्षा
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इस बार के लोकसभा चुनाव में महिला सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। मोदी, राहुल, केजरीवाल-सभी वायदा कर रहे हैं कि अगर वे सत्ता में आए, तो महिलाओं को पूरी सुरक्षा प्रदान करेंगे- रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा से लेकर चिकित्सा सुविधाएं तक। पूरे देश की बात तो दूर, राजधानी दिल्ली की स्थिति ही औरतों के खिलाफ अपराध के मामले में ठीक नहीं है। लड़कियां आगे आकर सवाल पूछ रही हैं कि नेता महिलाओं के लिए क्या करेंगे? लड़के भी ऐसे सवालों का हल जानना चाहते हैं, क्योंकि वे भी किसी के भाई हैं, किसी के पति हैं, तो किसी के दोस्त, चाचा, मौसा, ताऊ हैं। इन दिनों हर लड़की का सवाल लड़कों का सवाल बन गया है।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा है कि वह राजधानी में होने वाले अपराधों की मैपिंग करे, खास तौर से महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की जानकारी कोर्ट को दे। यह आदेश कोर्ट ने अधिवक्ता गौरव बंसल की याचिका पर दिया। जिसमें कहा गया था कि वर्ष 2013 में महिलाओं से छेड़खानी की घटनाओं में सात सौ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। दूसरी वकील ऋचा कपूर के सुझावों का भी कोर्ट ने संज्ञान लिया। ये सुझाव थे कि दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने के लिए महिला सुरक्षा दल बनाए जाएं। यौन अपराधियों की सूची बनाई जाए। सार्वजनिक स्थलों पर शराब पीने पर पूरी तरह प्रतिबंध हो और जनता के लिए साफ-सफाई सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।
इन सबको ध्यान में रखते हुए पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के एक सर्वेक्षण का जिक्र करना जरूरी है, जिसमें बताया गया है कि चौंसठ प्रतिशत कामकाजी महिलाएं दफ्तर में देर तक नहीं रुकना चाहतीं। वे दिन में काम करने में अधिक दिलचस्पी रखती हैं। एक जमाने में कंपनियां सुरक्षा कारणों से औरतों को रात की पाली में काम नहीं देती थीं। तब खुद औरतें इसका विरोध करती थीं। उनका तर्क था कि इस रोक के कारण औरतों के लिए रोजगार के मौके कम हो जाते हैं। तब इसे महिलाओं के प्रति भेदभाव के रूप में देखा जाता था, मगर आज स्थिति बदली हुई है। बड़ी संख्या में औरतें ऐसे दफ्तरों में काम करती हैं, जहां नाइट शिफ्ट होती है या देर तक काम करना पड़ता है। देर रात काम से लौटते हुए औरतों को सड़कों पर विभिन्न अपराधों का सामना करना पड़ता है।
उक्त सर्वे में विभिन्न वर्गों की चौंतीस सौ महिलाओं ने भाग लिया था। इनमें से बसों और मेट्रो में सफर करने वाली महिलाओं का कहना है कि मेट्रो देर रात तक चले। यही नहीं, बसें समय पर आएं और उनकी संख्या भी अधिक हो। यदि सड़क पर वे किसी मुसीबत में फंसती हैं, या किसी अपराध की शिकार होती हैं, तो ट्रैफिक पुलिस उनकी मदद करे। बहुत-सी महिलाओं का कहना है कि जिस तरह से विदेशों में एरियल सर्वे से सुरक्षा पर ध्यान दिया जाता है, भारत में भी ऐसे बंदोबस्त किए जाएं। 2008 से 2012 तक दिल्ली में औरतों के खिलाफ अपराध में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि अपराध नहीं बढ़े, उसकी रिपोर्टिंग बढ़ी है। उक्त सर्वे में 53 फीसदी औरतें दिल्ली से बाहर की हैं, जिनमें से 43 फीसदी ने अन्यत्र रोजगार मिलने पर दिल्ली छोड़कर जाने की इच्छा जताई। उन्हें लगता है कि वे यहां सुरक्षित नहीं हैं।
दिल्ली में यह असुरक्षा सिर्फ औरतों को ही परेशान नहीं करती, बल्कि लड़कों के साथ भी लूटपाट, कत्ल आम बात है। बेशक महिलाओं की सुरक्षा के मसले बड़े हैं, लेकिन जान की खैर सभी को चाहिए। राजनीतिक दलों को इसका खुलासा करना चाहिए कि वे अपने सभी नागरिकों को किस प्रकार सुरक्षित जीवन मुहैया कराएंगे। नई सरकार का एक प्रमुख मुद्दा नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा भी होना चाहिए।