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बातों का मौसम
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 28 Mar 2013 10:01 PM IST
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आज बहुत गरमी है।
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हां, गरमी तो है, वैसे कल भी कम नहीं थी। मगर आज कुछ ज्यादा ही है। अभी से यह हाल है तो आगे क्या होगा।
अब अप्रैल शुरू होनेवाला है, तो गरमी अब नहीं, तो क्या जून-जुलाई में पड़ेगी। जून के पहले हफ्ते में तो बारिश आ जाती है।
आजकल ऐसा होता कहां है, सारे ही मौसम तो एक-एक महीने आगे बढ़ गए हैं। क्या पता, जुलाई तक ही बारिश आ पाए।
मौसम शुरू तो टाइम पर ही होता है, हां आजकल कुछ लंबे खिंच जाते हैं। गरमी भी टाइम पर शुरू हो गई थी।
हां, हमने आबोहवा को इतना बिगाड़ दिया है कि अब तो मौसम का समय ही तय नहीं रहता है। पहले मौसम देखकर महीना बता देते थे, मगर अब तो सब उलटा-पुलटा हो रहा है।
हां, जंगल लगाए नहीं जा रहे और जो हैं, उन्हें जड़ से काटा जा रहा है, जंगल नहीं होंगे, तो मौसम तो गड़बड़ होना ही था।
हां, अब तो गांव में भी पेड़ नजर नहीं आते, हरियाली तो देखने को नहीं मिलती। सब तरफ कंकरीट के जंगल उग आए हैं आजकल। बरबाद कर दिया है हमने आबोहवा को।
हां, सरकार भी पेड़ न काटने का कानून बनाती है और पैसे लेकर खुद ही काट डालती है।
अब सरकार भी कहां-कहां हथेली लगाए, कुछ काम तो हमें भी करना ही पड़ेगा न। संजय गांधी ने पेड़ लगाने की शुरुआत की थी। उस समय जो पेड़ लगे थे, बस वही नजर आ रहे हैं, बाद में तो सरकार पेड़ लगाने से भी बचने लगी, जैसे नसबंदी हो।
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सारा कबाड़ा तो राजनीति ने किया है। बगैर राजनीति के कोई काम नहीं होते, हर जगह भ्रष्टाचार, हर जगह राजनीति, बर्बाद कर दिया देश को।
हां, यह तो है... पर इस बार गरमी ज्यादा ही पड़ रही है। अब पड़नी भी चाहिए, यदि अब गरमी नहीं पड़ेगी, तो बारिश कैसे होगी, अच्छा है जितनी गरमी होगी, उतनी ही बारिश होगी।
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वैसे, हर साल लगता यही है कि गरमी ज्यादा पड़ रही है। हां, मुझे भी कई साल से यही लग रहा है।
और सही भी है, अगर गरमी न पड़े, तो हम बात क्या करें, इसलिए भी गरमी का पड़ना जरूरी है। कम-ज्यादा तो हम अपने हिसाब से कर ही लेंगे। दोनों हंसते हैं और निकल पड़ते हैं अगले ठिए पर, फिर से वही गरमी की बातें करने।