एजेंट ही एजेंट
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ऐसा नहीं कि अपने यहां इंजीनियर और एमबीए ज्यादा हैं। एक जमाने में बीए, एमए और बीएड भी बहुत होते थे। पर एजेंटों की न तब कोई कमी थी, न अब कोई कमी है। फर्क यही है कि इंजीनियर और एमबीए तो बेरोजगार भी मिल जाते हैं, बीए, एमए और बीएड की तरह। पर एजेंट कोई बेरोजगार नहीं मिलता। फिर चाहे वह किसी का भी एजेंट क्यों न हो। बीमा कंपनियों के एजेंट हैं, चिटफंड कंपनियों के एजेंट हैं, दवा कंपनियों के एजेंट हैं, और भी न जाने किस-किस तरह के एजेंट हैं। एजेंट ही एजेंट, ले तो लें।
एक जमाने में जासूसी उपन्यासों के एजेंट बड़े मशहूर थे। लोग उन एजेंटों के कारनामे पढ़ने के लिए उतावले रहते थे। उस जमाने में मुल्क में सीआईए के एजेंट बहुत होते थे। वे साहित्य तक में होते थे।
वैसे एजेंट तो एफबीआई के भी होते हैं। पर वे शायद अमरीका तक ही सीमित रहते हैं, बाहर अपनी एजेंटी नहीं दिखाते। दुनिया संभालना सीआईए के जिम्मे है। उस जमाने में रूसियों के केजीबी एजेंट भी होते थे। माना जाता था कि जो सीआईए का एजेंट नहीं, वह केजीबी का एजेंट तो जरूर ही होगा। अब न सीआईए के एजेंट रहे, न ही केजीबी के। बल्कि सुना है कि जो केजीबी के एजेंट थे, वे तो राष्ट्रपति बन गए हैं। सीआईए वाले अपने देश में नहीं, विदेश में ही राष्ट्रपति वगैरह बन पाते हैं। इधर तो बस आईएसआई के एजेंट रह गए। जबकि हमें शिकायत रहती है कि हमारे वाले एजेंट पता नहीं, क्या करते रहते हैं।
लेकिन इधर काटजू साहब ने कुछ नए ही एजेंट ढूंढ निकाले हैं। उन्होंने कहा है कि महात्मा गांधी अंग्रेजों के एजेंट थे। अब तक यह माना जाता था कि गांधी जी ने अंग्रेजों को निकाल बाहर किया था। काटजू साहब यही तक नहीं रुके। उन्होंने कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान के एजेंट थे। अच्छा हुआ कि संसद में उनके खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास हो गया, वर्ना अब तक वह नेहरू वगैरह को भी किसी न किसी का एजेंट करार दे चुके होते। पिछले दिनों कांग्रेसियों ने केजरीवाल पर आरोप लगाया कि वे भाजपा के एजेंट हैं। जबकि भाजपा का कहना है कि केजरीवाल कांग्रेसी एजेंट हैं। पता ही नहीं चलता कि कौन किसका एजेंट है।