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बहरे शोर में

Sat, 22 Nov 2014 09:43 PM IST
संजय उपाध्याय
संजय उपाध्याय Updated Sat, 22 Nov 2014 09:43 PM IST
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sanjay upadhyaya poem.

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शुभ सा होता है दिन
खुश होती लड़की को देखकर।

मंगल सी लगती है शाम
फुटपाथ पर टहलती लड़की को देखकर।

शनि सा लगता है शहर
सोयी लड़की को देखकर।

आहट लगती है जाड़े की
ऊन में उलझी हुई लड़की को देखकर।

मौलिक सा लगता है मन
मोबाइल पर बतियाती बेटी को देखकर।

बहरे शोर में करता हूं सलाम
विजयी लड़की को देखकर।

----------------

जंगल

चौराहे पर खड़ा मैं,
अक्सर तुम्हारे आते जाते
चेहरे को टटोलता हूं।

पाता हूं या लगता है,
तुम्हारी आकृति,
भीड़ से भरा घना जंगल है।
बहरहाल, जंगलों से मुझे डर लगता है।
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