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रूस-यूक्रेन तनाव: तेल राजनीति भी संकट का एक पहलू

Mon, 21 Feb 2022 05:59 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Mon, 21 Feb 2022 05:59 AM IST
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सार
यूक्रेन संकट का एक सिरा तेल राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई से भी जुड़ा है। युद्ध जैसी स्थिति में रूस और अमेरिका के बीच तेल उत्पादन में वर्चस्व को लेकर भी विवाद खड़ा हो सकता है।
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Russia-Ukraine tensions: oil politics also an aspect of the crisis
यूक्रेन और रूस की सीमा पर तैनात टैंक। - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

यूक्रेन की सीमा से रूसी सैन्य टुकड़ियों की वापसी की खबर के बावजूद युद्ध की आशंका बढ़ती जा रही है और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का मानना है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो पूरी दुनिया पर उसका प्रतिकूल असर पड़ेगा और भारत भी उससे अछूता नहीं रह पाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन पर हमले से रूस को लाभ कम और नुकसान अधिक होगा, क्योंकि रूसी नागरिकों को पुतिन की आक्रामकता की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।



हालांकि यूक्रेन के खिलाफ रूस पूरी ताकत का इस्तेमाल शायद ही करे, लेकिन पुतिन इसका इंतजाम जरूर करेंगे कि यूक्रेन की सेना और पूर्वी यूक्रेन में रूस समर्थित अलगाववादी ताकतों के बीच झड़प जारी रहे। दरअसल यूक्रेन पर हमले की मंशा जताकर पुतिन वर्ष 1994 के बुडापेस्ट सुरक्षा समझौते का उल्लंघन करने की दिशा में बढ़ रहे हैं, जो अमेरिका, ब्रिटेन और रूस के बीच हुआ था। रूस हमेशा कहता आया है कि यूक्रेन की संप्रभुता की रक्षा वह उसी स्थिति में करेगा, जब यूक्रेन अपने परमाणु हथियारों का जखीरा नष्ट कर दे। लेकिन पुतिन पर भरोसे का कारण नहीं है, क्योंकि इससे पहले वह क्रीमिया को रूस में मिला चुके हैं। पुतिन की इस आक्रामकता से दूसरे पड़ोसी देशों पर हमले की आशंका भी बढ़ती है।


यूक्रेन संकट का एक सिरा तेल राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई से भी जुड़ा है। अगर रूस यूक्रेन पर हमला करता है, तो अमेरिकी प्रतिक्रिया सख्त आर्थिक, राजनीतिक प्रतिबंधों के रूप में सामने आएगी। ज्यादा आशंका इसी की है कि अमेरिका यूक्रेन की सैन्य मदद के लिए आगे आएगा। रूसी हमले से यूरोप की सुरक्षा के खतरे में पड़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। आंकड़ा बताता है कि यूरोपीय संघ द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली प्राकृतिक गैस की 25 फीसदी आपूर्ति रूस द्वारा की जाती है और यह गैस यूक्रेन स्थित पाइपलाइन से गुजरती है। दरअसल यूक्रेन संकट ने कच्चे तेल उत्पादन की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को रफ्तार दे दी है। तेल उत्पादन से जुड़ी तमाम वैश्विक कंपनियों ने भविष्य में ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए तेल उत्पादन में निवेश बढ़ाने की बात कही है। अमेरिका कच्चे तेल का बड़ा उत्पादक है, पर रूस इसका बड़ा निर्यातक है।

वह प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात करता है। जाहिर है, यूक्रेन पर रूस हमला करता है और यह संघर्ष बड़ा आकार लेता है, तो रूस के तेल उत्पादन में कमी का असर कमोबेश पूरी दुनिया पर पड़ेगा। अभी रूस और ओपेक में उसके सहयोगी देश तेल उत्पादन और निर्यात में वृद्धि कर रहे हैं, क्योंकि महामारी के बाद कच्चे तेल की वैश्विक खपत में वृद्धि हुई है, जिसके आगामी गर्मियों में और बढ़ने की संभावना है। अगर आने वाले दिनों में कच्चेतेल के मूल्य में भारी तेजी आती है, तो अमेरिकी तेल कंपनियां ज्यादा लाभ कमाने के लिए उत्पादन बढ़ाएंगी, जिसका प्रतिकूल असर रूस पर पड़ेगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि यूक्रेन संकट के कारण रूस के कच्चे तेल का निर्यात घटता है, तो ओपेक में उसका सहयोगी सऊदी अरब इसका लाभ उठाने की कोशिश करेगा और अपना तेल निर्यात बढ़ाएगा।

यूक्रेन संकट ने भारत को अजीब स्थिति में खड़ा कर दिया है। अमेरिका चाहता है कि यूक्रेन मामले में भारत रूस का विरोध करे, जबकि इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भारत रूस का समर्थन कर चुका है। विगत छह महीनों में यह चौथा अवसर है, जब यूक्रेन संकट पर भारत रूस के साथ खड़ा हुआ है। तथ्य यह है कि हाल के वर्षों में भारत ने अमेरिका के साथ इतनी गर्मजोशी दिखाई कि पुराने मित्र रूस के अलग हो जाने का खतरा पैदा होने लगा था। खासकर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय भारत-अमेरिका दोस्ती अपने शिखर पर थी। लेकिन रूस से एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की खरीद का सौदा कर भारत ने जल्दी ही अपनी भूल सुधारी। तब अमेरिका ने भारत पर यह सौदा रद्द करने का दबाव डाला था और प्रतिबंध लगाने की धमकी तक दी थी, लेकिन भारत नहीं झुका। यूक्रेन संकट वह दूसरा अवसर है, जब भारत रूस के साथ खड़ा है। इस तरह भारत कूटनीतिक मोर्चे पर उस रूस को अपने साथ होने के लिए तैयार कर सकेगा, जो पिछले काफी समय से चीन के बहुत नजदीक चला गया था। जब चीन पिछले काफी समय से भारतीय सीमाओं पर लगातार आक्रामकता का परिचय दे रहा है, तब रूस से नजदीकी भारत के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि वैसी स्थिति में चीन भारत के खिलाफ आक्रामकता से बचेगा। अगर रूस विभिन्न मुद्दों पर भारत के साथ खड़ा होता है, तो चीन अपने आप कमजोर होगा।

सच यह है कि रूस के साथ खड़े होने की भारत की इस कूटनीति की मास्को ने तारीफ की है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के रवैये को उसने 'संतुलित, उसूलों पर आधारित और स्वतंत्र' बताया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रूस ने अफगानिस्तान मुद्दे पर भारत के रुख का समर्थन किया है, कश्मीर मुद्दे पर भी वह भारत के साथ है, जबकि अमेरिका ने अफगानिस्तान के मुद्दे पर दोहा में हुई बैठक में न केवल पाकिस्तान का साथ दिया था, बल्कि इस्लामाबाद के अनुरोध पर भारत को अलग-थलग भी कर दिया था। लेकिन यूक्रेन पर रूसी हमले का नतीजा भारत को भी भुगतना पड़ेगा, क्योंकि तब कच्चा तेल बढ़कर 120 डॉलर हो सकता है, जिसका भीषण असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यूक्रेन में रह रहे करीब 20,000 भारतीयों को भी अपने देश में लाना पड़ेगा और उनका भविष्य अनिश्चित हो जाएगा। यूक्रेन संकट के गहराने का असर चूंकि पूरी दुनिया पर पड़ेगा, वैसे में भारत का वैश्विक व्यापार भी बहुत हद तक प्रभावित होगा।

माना यह जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में रूस अगर सचमुच यूक्रेन पर हमला कर देता है, तब भी अमेरिका सीधे-सीधे रूस के खिलाफ युद्ध में नहीं उतरेगा, क्योंकि अफगानिस्तान के कटु अनुभव से उसने सबक सीखा है। अमेरिकी राष्ट्रपति और यूरोपीय संघ के नेता मानते हैं कि आपसी संवाद के जरिये अब भी यूक्रेन संकट का समाधान निकाला जा सकता है और यह रूस तथा दुनिया के हित में भी है।

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