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ग्रामीण बाजारों को बहुत उम्मीदें हैं इस बजट से

Fri, 04 Jul 2014 12:36 AM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Fri, 04 Jul 2014 12:36 AM IST
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Rural markets have alot of expectations from this Budget

देश में ग्रामीण उपभोक्ता उपभोक्ता बाजार में बढ़ते जा रहे हैं। देश के केवल नब्बे हजार गांवों में मारूति कार की एक तिहाई बिक्री हो रही है। हिंदुस्तान यूनिलीवर एक कार्यक्रम के जरिये मोबाइल फोन पर रेडियो की सुविधा मुहैया करा रही है और अपने उत्पादों को उत्तर भारत के उन इलाकों में तेजी से आगे बढ़ा रही है, जहां अभी तक मीडिया की पर्याप्त पहुंच नहीं है।

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हमारे ग्रामीण बाजारों के प्रति दुनिया की बड़ी कंपनियां भी दिलचस्पी दिखा रही हैं। अधिकतर बड़ी कंपनियां गांवों की जरूरतों और वहां रह रहे उपभोक्ताओं के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश कर रही हैं। बढ़ते बजट आवंटन के कारण ग्रामीण बाजार में खरीद क्षमता बढ़ रही है। ग्रामीण विकास योजनाओं तथा भारत निर्माण योजना के बजट आवंटन में भारी वृद्धि की गई है। किसान कर्ज माफी योजना और कर्ज राहत योजना के लिए दिया गया धन भी लोगों के पास है। ग्रामीण क्षेत्र में मध्य वर्ग की संख्या बढ़ रही है। इस वजह से भी ग्रामीण बाजार कंपनियों के आकर्षण का केंद्र बन गए हैं।
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ऐसे में, वित्त मंत्री को ग्रामीण बाजार में नई मांग के निर्माण के लिए प्रयास करने होंगे। ग्रामीण बाजार के समक्ष जो विभिन्न चुनौतियां हैं, उनके निराकरण के लिए भी उन्हें कदम बढ़ाने होंगे। ग्रामीण क्षेत्र में नई विपणन नीतियों के लिए सरकार द्वारा कंपनियों को सहयोग देना होगा। आम तौर पर विपणन कंपनियों को ग्रामीण बाजारों की क्षमता का कम ज्ञान होता है। शहरी इलाकों के मुकाबले ग्रामीण बाजार में जोखिम भी अधिक है। अब भी ग्रामीण आबादी तक उत्पादों की जानकारियां पहुंचाना कठिन काम है। ऐसे में जो कंपनियां गांवों में अच्छी पकड़ बनाना चाहती हैं, उन्हें व्यापक बाजार सर्वेक्षण करना होगा।
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सरकारी बैंकों को भी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी गतिशीलता बढ़ानी होगी। देश के राष्ट्रीयकृत एवं सार्वजनिक क्षेत्र के जिन 26 बैंकों के पास कुल बैंकिंग परिसंपत्तियों का तकरीबन 70 फीसदी हिस्सा है, उनका रुझान ग्रामीण क्षेत्र की तरफ नहीं हैं। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि ग्रामीण भारत के 40 फीसदी लोगों तक कोई भी औपचारिक वित्तीय सेवा नहीं पहुंच पाई है। यद्यपि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्र में छोटे, सीमांत किसानों, दस्तकारों, कारीगरों, लघु एवं कुटीर उद्यमियों को ऋण उपलब्ध करा रहे हैं। पर अब भी लक्ष्य के अनुरूप परिणाम नहीं मिल पाए हैं।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का पूंजी आधार बेहद कमजोर है। बैंकों की ओर से ऋण वसूली ठीक ढंग से नहीं हो पा रही। ऋण का दुरुपयोग, कर्जदारों की गलत पहचान, लगातार कार्रवाई की कमी, बेनामी ऋणों के विस्तार तथा ग्राहकों की असंतुष्टि जैसी कई समस्याएं हैं। ग्रामीण बाजारों के स्वस्थ विकास के लिए इन बैंकों में ऐसी समस्या के समाधान के लिए त्वरित कदम जरूरी है।


तेजी से बढ़ते ग्रामीण बाजारों के बीच जहां भोले-भाले ग्राहकों को शोषण से बचाने की पहल करनी होगी, वहीं गुणवत्ता नियंत्रण के लिए ग्रामीण बाजार नियामक आयोग गठित करना होगा। तभी देश भर में ग्रामीण बाजार आकार लेगा। इससे जहां अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, वहीं ग्रामीण उपभोक्ताओं को अधिकतम ग्राहक संतुष्टि भी प्राप्त होगी।

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