ग्रामीण भारत और थोड़ी सियासत
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वर्ष 2017-18 के बजट से कुछ दिलचस्प वित्तीय आंकड़ों का पता चलता है। वित्त मंत्री ने बताया कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से कर संग्रह 73 हजार करोड़ रुपये से ऊपर चला गया है। राजकोषीय घाटा 3.5 फीसदी के करीब है और राजस्व घाटा 2.3 फीसदी से घटकर 2.1 फीसदी पर चला आया है, जो एक अच्छी खबर है। खर्च नियंत्रण में है और कर संग्रह 17 फीसदी से ऊपर चला गया है। पिछले वर्ष भी यह आंकड़ा 17 फीसदी से ऊपर था, जो ज्यादातर कच्चे तेल के मूल्यों में गिरावट के कारण हुआ। लेकिन कहा जा रहा है कि कर संग्रह की गति अच्छी है। अगले वर्ष के अनुमानों से संकेत मिलता है कि कर संग्रह में मात्र 12.3 फीसदी की वृद्धि होगी-अप्रत्यक्ष कर में 8.8 फीसदी और प्रत्यक्ष कर में 15.3 फीसदी। अप्रत्यक्ष कर के बारे में हमें बेहद सावधान रहना होगा, क्योंकि जीएसटी आने वाला है और हमें नहीं मालूम कि उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
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अगर आप यह देखना चाहें कि बजट में किन चीजों पर ध्यान दिया गया है, तो यह एक राजनीतिक बजट लगेगा, जिसमें किसानों, ग्रामीण क्षेत्रों, गरीबों, महिलाओं, इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सुशासन लाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इन सभी क्षेत्रों में आवंटन बढ़ाया गया है, खासकर किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए। इस वर्ष के बजट में ग्रामीण क्षेत्रों में आवास पर जोर दिया गया है। मनरेगा का भी आवंटन बढ़ाया गया है और वित्त मंत्री चाहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा परिसंपत्तियां निर्मित की जाएं।
शिक्षा के बारे में वित्त मंत्री ने कहा कि निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों की शिक्षा में सुधार लाया जाएगा और अच्छे विश्वविद्यालयों में ज्यादा शैक्षणिक स्वतंत्रता रहेगी। चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में पोस्ट ग्रेजुएट की पांच हजार और सीटों का प्रस्ताव अच्छा है। मेडिकल काउंसिल एवं यूजीसी में सुधार लाया जाएगा। कौशल विकास में आवंटन बढ़ाना सराहनीय कदम है।
परिवहन क्षेत्र के लिए 2,41,387 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। एक नई मेट्रो रेल नीति की घोषणा होगी, जिसमें कार्यान्वयन के अनोखे तरीके और वित्त पोषण पर ध्यान दिया जाएगा। राजमार्गों के लिए बजट आवंटन को 58,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 64,900 करोड़ रुपये किया गया है। आगामी वित्तीय वर्ष में 3,500 किलोमीटर नई रेल लाइनें बिछाई जाएंगी।
शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर की बातें तो बहुत की गईं, लेकिन मुझे इसके लिए बजट आवंटन में वृद्धि नहीं दिखी। शहरीकरण से रोजगार सृजन होगा, इसलिए शहरीकरण जरूरी है। भारत अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था नहीं है। जीडीपी में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान मात्र 25 फीसदी है, जबकि वहां 60 फीसदी आबादी रहती है। जब तक शहरीकरण पर जोर नहीं दिया जाएगा, भारत न तो अपेक्षित गति से विकास करेगा और न ही रोजगार पैदा होंगे।
वित्त मंत्री ने एक बहुत ही क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि गुमनाम राजनीतिक चंदे की सीमा को बीस हजार रुपये से घटाकर दो हजार रुपये कर दिया गया है। यह अच्छा कदम है, जिससे चुनावों में काले धन का इस्तेमाल घटेगा।
व्यक्तिगत करों को छोड़कर काले धन के खिलाफ जंग जारी है। काले धन के मामले में उन्होंने जो कहा और जो किया, उसके बीच खाई चौड़ी है। व्यक्तिगत कर के मामले में सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो लोग व्यवसाय या किसी पेशे से जुड़े हैं, वे पांच लाख से 25 लाख के दायरे में अपनी आय की घोषणा नहीं करते, इसे 'गायब मध्य' के रूप में जाना जाता है। पांच लाख तक की आय वाले लोगों को कर में छूट देते हुए कर की दर 10 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी किया गया है, जो अच्छी बात है। लेकिन पांच से 25 लाख की आमदनी वाले लोगों को बहुत ज्यादा लाभ नहीं दिया गया है। वित्त मंत्री को इस वर्ग के लोगों के लिए भी कर की दर पांच फीसदी रखनी चाहिए, ताकि ज्यादा लोग अपनी आय की घोषणा करें। ईमानदार वेतनभोगी लोग जो कठिन परिश्रम से 50 लाख रुपये से ज्यादा कमाते हैं, उन्हें बड़ा झटका दिया गया है, क्योंकि उन्हें दस फीसदी सरचार्ज भी देना होगा। व्यवसाय करके 50 लाख से ज्यादा कमाने वाले तो अपनी आय को कम दिखाकर सरचार्ज से बचने के तरीके अच्छी तरह से जानते हैं, पर ईमानदार वेतनभोगी को तगड़ा झटका लगेगा। वित्त मंत्री ने कहा कि वह ईमानदार लोगों को ज्यादा प्रोत्साहित करना चाहते हैं, लेकिन संभवतः उन्होंने इस अधिभार के साथ उच्च कर दायरे में आने वाले ईमानदारों की अनदेखी कर दी।
पचास करोड़ के राजस्व वाली कंपनियों के कॉरपोरेट टैक्स को घटाकर उन्होंने 25 फीसदी कर दिया है। वर्ष 2015-16 में प्रभावी कर की दर 28.24 फीसदी थी। उन्हें सेवा प्रदाता कंपनियों और बैंकों के लिए भी कर की दर घटाकर 25 फीसदी करनी चाहिए, जो काफी रोजगार मुहैया कराते हैं। रोजगार सृजन के मामले पर बातें तो काफी होती हैं, लेकिन रोजगार बढ़ाने के लिए कौशल विकास और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को छोड़कर कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया है। हमारे देश में हर वर्ष 60 लाख युवा कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त कर निकलते हैं। लेकिन उनके लिए रोजगार कहां है? वे सभी ह्वाइट कॉलर जॉब चाहते हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर, ग्रामीण आवासीय क्षेत्र ह्वाइट कॉलर जॉब का निर्माण नहीं करते, जिसकी युवाओं को जरूरत है। पटेल आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, जाट आंदोलन और तमाम तरह के आंदोलन सिर्फ इसलिए होते हैं, क्योंकि शिक्षित लोगों के लिए रोजगार नहीं है। बजट में रोजगार बढ़ाने के लिए कुछ नहीं है।
इस बजट में कर आतंकवाद के बारे में बहुत कुछ नहीं कहा गया, जिससे कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर तो पीड़ित होते ही हैं, कॉरपोरेट क्षेत्र का इसके जरिये काफी उत्पीड़न होता है। स्टार्ट अप के लिए कुछ घोषणाएं तो हुई हैं, लेकिन और भी कदम उठाने की जरूरत है। कुल मिलाकर यह बजट अच्छा है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह के बजट पेश करने की प्रवृत्ति रही है, यह वैसा ही है, लेकिन यह और परिवर्तनकारी हो सकता था।