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सुशासन में नागरिक समाज की भूमिका
महीपाल
Updated Sat, 20 Jan 2018 06:14 AM IST
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ग्रामीण विकास
राज्य के नागरिकों की सेवा करने की क्षमता का अर्थ ही सुशासन है। सुशासन के अंतर्गत वे सभी नियम व कानून प्रक्रियाएं, संसाधन एवं व्यवहार शामिल हैं, जिनके द्वारा नागरिकों के मसले व्यक्त किए जाते हैं, संसाधनों का प्रबंधन किया जाता है और शक्ति का प्रयोग किया जाता है। अर्थात राज्य द्वारा संसाधन एवं शक्ति का प्रयोग समाज के विकास एवं कल्याण के लिए किया जाता है। सुशासन को प्रभावी ढंग से लागू करने करने में राज्य / सरकार, बाजार एवं नागर समाज (सिविल सोसाइटी) की महत्वपूर्ण भूमिका है। नागर समाज के अंतर्गत गैर-सरकारी संगठन, नागरिक समाज के संगठन, मीडिया संगठन, एसोसिएशन, ट्रेड-यूनियन व धार्मिक संगठन आते हैं।
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सुशासन को अमल में लाने के लिए नागरिक समाज का अहम स्थान है, क्योंकि यही समाज की क्षमता में वृद्धि करते हैं और उसे जागरूक बनाते हैं। यही सरकार या राज्य को आगाह करते हैं कि कैसे नागरिकों की भागीदारी से उनका संपूर्ण विकास किया जाए। नागरिक समाज सामूहिकता को बढ़ावा देकर सहभागिता को सामाजिक जीवन का अंग बनाता है।
एनजीओ वे संस्थाएं होती हैं, जिनकी गतिविधि सरकारी या विदेशी संस्थाओं के सहयोग से चलती हैं। इन संस्थाओं को बढ़ावा देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सामान्यतः वे होते हैं, जिनका समाज से सरोकार होता है और वे अपने प्रारंभिक ‘करियर’ में सामाजिक कार्यकर्ता ही रहे। लेकिन बाद में एक संस्था बनाई, उसे पंजीकृत कराया और तीन वर्ष बिना कोई सरकारी या विदेशी सहायता लिए कार्य करते रहे, अक्सर झूठी-सच्ची ‘बैलेंस-शीट’ बनाते रहे और बाद में सरकारी अनुदान प्राप्त करने योग्य हो गए। ऐसी संस्थाएं सरकार एवं उसके नौकरशाहों से तालमेल करके अपनी गतिविधियां चलाती हैं। लेकिन देखने में यह आया कि ऐसी संस्थाओं में विचार तो होता है, लेकिन धार नहीं होती। संघर्ष करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। वे अधिकतर पीपीटी/लैपटॉप व हवाई-सफर में व्यस्त रहने में ही उलझकर रह जाते हैं।
गैर-सरकारी संगठनों को प्रोत्साहित करने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन लोक-कार्यक्रम एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद (कपार्ट) है। लेकिन तीन सितंबर,2013 को मंत्रिमंडल ने अपनी बैठक में कपार्ट को दो वर्ष के अंदर बंद करने का निर्णय लिया था। सरकार द्वारा ऐसा निर्णय लेना ही बहुत कुछ व्यक्त करता है कि कर्पाट का ‘कबाड़ा’ क्यों हुआ। इससे अधिक कुछ और कहने की जरूरत नहीं। इस समय जरूरत सामाजिक आंदोलनों की है। ग्रामीण समाज के लोग नेताओं एवं नौकरशाहों के रवैये से ऊब चुके हैं। वे चाह रहे हैं कि कोई उनको साथ लेकर चले। उनके साथ सहभागितापूर्ण कार्य करे। उन्हें हर कार्य में निर्णायक बनाए। वे केवल अपना मत देने तक ही सीमित न रहें।
इस तरह का प्रयास उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में अखिल भारतीय मताधिकार संघ कर रहा है। उसी का उदाहरण देकर यह बताना उचित प्रतीत होता है कि ऐसे आंदोलनों की देश में जरूरत है। मताधिकार संघ ने जमीनी हकीकत इस प्रकार बयान की है कि प्रधानमंत्री आवास योजना, राशन-कार्ड एवं राशन-वितरण में भ्रष्टाचार, पुलिस-उत्पीड़न, निजी भूमि एवं सार्वजनिक भूमि पर दबंगों का कब्जा, पेयजल की उचित व्यवस्था का अभाव, बिजली-विभाग, सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार, पेंशन योजना में अनियमितता, अवैध शराब निर्माण, शौचालयों के निर्माण में धांधली, सड़क एवं जल निकासी की समस्या, बैंकों में भ्रष्टाचार यानी चारों ओर केवल भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है, कहीं भी नवाचार नहीं है। विभिन्न गांवों से लगभग 35,000 शिकायतें आने की उम्मीद है, जिनको जिला-प्रशासन को आवश्यक कार्यवाही के लिए सौंपना है।
जब व्यक्तिगत संपर्क के माध्यम से चारा नहीं चला, तब जिले के ग्यारह ब्लॉकों में सामाजिक न्याय पदयात्रा निकालने का निर्णय लिया गया। सामाजिक न्याय यात्रा के दौरान सकारात्मक प्रभाव पड़ा। प्रथम, अखिल भारतीय मताधिकार संघ के पदाधिकारी मुख्य कार्यकर्ताओं-पीएन कलकी व प्रोफेसर राकेश गोयल के नेतृत्व में प्रदेश के सचिव राजीव कुमार से मिले। इसी प्रकार सीतापुर जनपद के जिलाधिकारी से भी मताधिकार संघ के पदाधिकारी मिले। दूसरा, जरूरतमंदों को 2,000 राशन कार्ड वितरित किए गए, जो कि एक साल से लंबित पड़े थे। तीसरे, प्रधानमंत्री आवास योजना में हो रही धांधलियों के मद्देनजर 28 ग्राम-सचिवों को निरस्त किया गया। चौथा, 32 प्रधानों की वित्तीय शक्तियां छीनी गईं। पांचवां, 200 नोटिस ग्राम-पंचायतों को जारी किए गए, क्योंकि ग्रामसभा तथा ग्राम स्तर पर छह समितियों द्वारा फर्जी कार्यवाही करके दस्तावेज जारी किए गए। इन पंक्तियों का लेखक भी एक दिन इस यात्रा में शामिल रहा। मताधिकार संघ के कुछ पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं से चर्चा के दौरान पता चला कि हाशिये के लोगों में उम्मीद जगी है। उनमें यह विश्वास जगा है कि उनका कार्य सिर्फ वोट डालना नहीं, शासन को सुशासन में तब्दील करना है। सामाजिक न्याय यात्रा से ग्रामीण समाज को तुरंत जो लाभ हुआ, वह यह कि वे समझने लगे हैं कि उन्हें अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी है। उनका हक छीनने वाले अधिकारियों को सही रास्ते पर लाना है।
यह भी निर्णय लिया गया है कि यात्रा के दौरान प्राप्त शिकायतें यदि शासकीय डाक में अंकित कर न भेजी गई, तो इस यात्रा में शामिल कार्यकर्ता प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायतें पेश करने दिल्ली कूच करेंगे।
गांवों में यदि वास्तव में विकास करना है, तो उसके लिए एनजीओ संस्कृति को बदलना होगा। हां, इन संस्थाओं का कार्य प्रशिक्षण देकर सामाजिक कार्यकर्ता बनाना तथा उच्च-स्तर की खोज एवं दस्तावेज तैयार करना हो सकता है। ग्रामीण समाज में जागरूकता और हाशिये के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए तो आंदोलन होना ही चाहिए, जिनमें वे लोग ही संचालक हों, वे ही संसाधन मुहैया कराएं एवं उसका निरीक्षण एवं मूल्यांकन करें। मताधिकार संघ इसका जीवंत उदाहरण है।