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राजनीति में रिस्क बहुत है
अरविंद तिवारी
Updated Fri, 22 Feb 2013 09:53 PM IST
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भाई साहब! आपको क्या लगता है, ये फूल मालाएं, जो मेरे गले में पड़ी हैं, किसी लॉटरी का परिणाम हैं? राजनीति का धंधा इतना सुगम, सहज और सरल होता, तो देश में सत्तर फीसदी आबादी बीपीएल नहीं होती। 84 करोड़ जनता बीस रुपये प्रतिदिन पर गुजारा नहीं करती। आपने वह कहावत तो सुनी ही होगी कि पराई थाली में घी कुछ ज्यादा ही दिखता है।
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सच तो यह है कि जो दिखता है, वह ‘वर्चुअल’ होता है। हम अभी जहां हैं, वहां कैसे पहुंचे हैं, यह बताएं, तो आपकी आंखें छलक पड़ेंगी! हमें राजनीति पुश्तैनी जागीर की तरह नहीं मिली। नगरपालिका के मेंबर से शुरू करके हम यहां तक पहुंचे हैं। इस शिखर तक पहुंचने में कितने पापड़ बेले हैं, यह मुझसे बेहतर भला और कौन जान सकता है।
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भाई साहब! राजनीति में सब कुछ त्यागना पड़ता है। सबसे पहले हमने इज्जत छोड़ी, क्योंकि राजनीति में आने पर आप जरूरत पड़ने पर इसे कभी भी, कहीं भी खरीद सकते हैं। खुलेआम मिलती है यह, बस नोटों की हरियाली दिखाने की जरूरत है। कभी-कभी कुछ और तिकड़म भी करने पड़ते हैं।
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आपको तो पता ही होगा कि इज्जत को गले में लटकाकर राजनीति करने वाला बंदा तुरंत बेआबरू करके धकिया दिया जाता है। फिर तो गई भैंस पानी में। भाई साहब! आपने बचपन में सांप-सीढ़ी वाला खेल तो खेला ही होगा। न जाने कितनी बार वहां निन्यानबे का फेर पड़ता है। ठीक उसी तरह अगर आप राजनीति की बिसात पर सांप के फेर में पड़ गए, तो गए काम से।
दोबारा जीरो से शुरुआत करनी होगी। और फिर दोबारा उन सारी मुसीबतों से दो-चार होना होगा, जो यहां तक पहुंचने की राह में कांटों की तरह बिछी रहती हैं। यह अनुभव कितना खतरनाक होता है, यह मुझसे पूछिए। कभी बेध्यानी में हम किसी ऐसे समारोह में चले गए थे, जहां एक मोस्ट वांटेड अपराधी हमारे साथ मंच पर बैठा था। अब उस समारोह का फोटो मेरे करियर में कबाब की हड्डी बन गया है।
भाई साहब! आपका करियर हमसे बेहतर है, क्योंकि अगर आपने किसी संपादक या समीक्षक की तारीफ कर दी, तो वह गद्गद होकर आपको ‘अमर’ कर देगा। लेकिन राजनीति में यदि आपने अपने नेता से कह दिया कि मेरी इच्छा आपको प्रधानमंत्री देखने की है, तो वह आपको डांट सकता है।
चुपके-चुपके नहीं, खुलेआम- सभी लोगों के सामने। दिक्कत है कि हम अपने नेता की विरुदावलियां न गाएं, तो गुमनामी में खोने का रिस्क रहता है, और गाने लगें, तो क्रोध का शिकार बन सकते हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं कि हम जैसा जो नेता राजनीति में आलाकमान के मूड को भांप लेता है, वही सफल होता है। ऐसे लोग जब बयान देते हैं, तो उन्हें डांट नहीं सुननी पड़ती है। शाबाशी में पीठ थपथपाए जाते हैं।
वैसे पार्टी आलाकमान का गुस्सा जायज है कि ढोल पीटने के बजाय पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए कोई ठोस काम उठाना चाहिए। हद है कि आप अपने राज्य से एक-चौथाई सीटें भी पार्टी को नहीं जितवा सकते, मगर उन्हें जल्दी से जल्दी प्रधानमंत्री बनने की सलाह दे रहे हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें, तो 'विष' पीने की नसीहत दे रहे हैं। ऐसे में नेता आपकी बेहूदगी से आजिज आकर डांटे नहीं, तो क्या आपके चरण धोएं!
पार्टी जब सत्ता में होती है, तो आलाकमान के साथ अपने फोटो का होर्डिंग तक नहीं टांग सकते, मगर जब पार्टी विरोध में होती है, तो नेताओं के फोटो अपने साथ छपवाने पर पीठ ही थपथपाई जाती है। भाई साहब! मैं अपने ड्राइवर के थुलथुल बदन को लेकर चिंतित रहने के कारण उसे योग करने की सलाह देता रहता था।
एक बार मैंने जब सलाह देने की अति कर दी, तो वह बोला, ठीक है मैं अभी इसी वक्त स्टेयरिंग छोड़कर योग शुरू करता हूं। वह दिन था और आज का दिन है, मैंने ड्राइवर से कभी योग की चर्चा नहीं की। ड्राइवर से मुझे सबक मिल गया है। अब मैं किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने की सलाह नहीं देता।