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संत के संसर्ग का परिणाम
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 12 Dec 2012 10:14 PM IST
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नीतिग्रंथों में भी कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें बताया गया है कि संत के सत्संग में रहने का जीवन में कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर अपना परलोक संवारता है।
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बलख का बादशाह असीमित धन होने के बावजूद आत्मिक संतोष की अनुभूति नहीं कर पाता था। उसे संसार से विरक्ति होने लगी। एक दिन उसने वजीर से कहा, मुझे किसी पहुंचे हुए संत के दर्शन को ले चलो। बादशाह को साथ लेकर वजीर लाहौर की ओर रवाना हो गया। लाहौर के पास जंगल में मियां मीर एक झोपड़ी में रहते थे। मियां मीर को जब पता चला कि बादशाह उनके दर्शन के लिए आ रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत यह हिदायत दे दी कि बादशाही ठाठ-बाट वाला कोई व्यक्ति उनके पास नहीं आएगा।
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बादशाह को जब यह पता चला, तो उसने अपना सारा सामान गरीबों में बंटवा दिया और साधारण वेश धारण कर संत की कुटिया के पास पहुंचा। मियां मीर ने दूर से ही कहला दिया, जंगल में एक और फकीर रहते हैं। कुछ दिन उनकी सेवा करो, उन जैसा साधारण जीवन बिताओ, तब तुम्हें दर्शन का मौका दिया जाएगा।
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बादशाह ने जंगल में रहकर संत की सेवा की। खुदा की इबादत में जीवन लगाने का संकल्प लिया। मियां मीर ने खुश होकर बादशाह को आशीर्वाद देते हुए उसका नाम 'बुल्लेशाह' रख दिया। संत के संसर्ग ने बादशाह को भी संत बना दिया।