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क्रिकेट के जरिये आतंक को जवाब

Thu, 09 Mar 2017 06:45 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Thu, 09 Mar 2017 06:45 PM IST
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Reply to terror through cricket
मरिआना बाबर

दर्शकों से खचाखच भरे किसी पाकिस्तानी स्टेडियम में शाम से देर रात तक चलने वाले किसी क्रिकेट मैच का मजा लेने के लिए आपमें काफी हौसला और बहादुरी होनी चाहिए, क्योंकि सुरक्षा यहां एक बड़ी वजह रही है। लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में हुए पाकिस्तानी सुपर लीग (पीएसएल) का फाइनल मैच देखने के लिए अपने डर को दरकिनार करते हुए बड़ी संख्या में दर्शक स्टेडियम में मौजूद थे। इनमें लाहौरवासियों के अलावा, पख्तूनख्वा, बूचिस्तान और सिंध से आए दर्शक भी शामिल थे।

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पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार और सेना ने स्टेडियम में मौजूद दर्शकों, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। ये लोग पांच सौ रुपये से लेकर बारह हजार रुपये तक के टिकट खरीदकर मैच का मजा लेने आए थे। लोगों की इस उदारता और धैर्य की तारीफ की जानी चाहिए, क्योंकि कुछ दिन पहले ही लाहौर के ऐतिहासिक चारिंग क्रॉस इलाके और शहवान शरीफ सहित कई जगहों पर आतंकी हमले हुए हैं, जिनमें काफी लोग मारे गए थे। रविवार को हुआ पीएसएल का फाइनल मैच सही मायने में आतंकियों और कट्टरपंथियों को करारा जवाब था। पाकिस्तानी दर्शकों ने दिखाया कि उन्हें डराया और धमकाया नहीं जा सकता है और वे क्रिकेट के बल्ले और गेंद से आतंकवाद का जवाब देने के लिए तैयार हैं। फाइनल मैच के दौरान हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में शहवान शरीफ मारे गए लोगों के सम्मान में कलाकारों और गायकों ने शूफी गीत दमा दम मस्त कलंदर भी प्रस्तुत किया।
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हालांकि बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था से होने वाली परेशानी के कारण कई नागरिकों ने इसकी शिकायत भी की, मगर वे शायद भूल गए कि यह एक अलग दुनिया है और यह बदला हुआ पाकिस्तान है। आज दुनिया का कोई भी हिस्सा आतंकी हमलों से बचा नहीं है। आज आतंकवाद शब्द का कोई अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्य अर्थ भी नहीं है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख जनरल असद दुर्रानी 'आतंक' शब्द का ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि इसका संबंध 1795 की फ्रांसीसी क्रांति से है, बल्कि इससे पहले 11वीं सदी के ईरान में हसन बिन सबाह अपने अनुयायियों को गांजा का नशा देते थे, ताकि उनमें हिंसक प्रवृत्तियां पैदा हों। उनके मुताबिक, अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी में बम गिराया जाना, इराक और अफगानिस्तान में नागरिकों पर हुई बमबारी और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन की ड्रेसडेन में की गई बमबारी आतंकवादी कार्रवाइयां थीं।
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मेरा यह मानना है कि हम दुनिया से अलग-थलग होकर सिर्फ अपने क्षेत्र में सीमित रहकर इस बुराई से अकेले नहीं निपट सकते। हमारे क्षेत्र का कोई भी देश आतंकवाद को अकेले अपने दम पर खत्म करने की उम्मीद नहीं कर सकता, क्योंकि सीमाओं को लांघकर आतंकवादी आवाजाही करते हैं और उन्हें स्थानीय लोगों का समर्थन भी मिलता है। इसके अलावा माफिया उन्हें हथियार और धन मुहैया कराता है। यदि हम अपने क्षेत्र पर गौर करें तो, पाकिस्तान, भारत, ईरान और अफगानिस्तान, इन चारों देशों के हित में है कि उनमें आर्थिक प्रतिद्वंद्विता हो, लेकिन उनके बीच में खुफिया जानकारियों के अदान-प्रदान को लेकर किसी तरह का समन्वय स्थापित नहीं हो सका है।

वास्तव में लाहौर में गद्दाफी स्टेडियम की फ्लडलाइट्स के बंद होते ही देश अपनी पुरानी सच्चाई की ओर लौट गया। फौज ने सरकार से मांग की है कि वह पूर्व सैन्य प्रमुख राहील शरीफ के कार्यकाल के दौरान दो वर्ष के लिए स्थापित किए गए 11 मिलिट्री कोर्ट का कार्यकाल बढ़ाए। यह अलोकतांत्रिक कदम इसलिए उठाया गया था, क्योंकि पाकिस्तान की न्यायपालिका कमजोर हो गई है, अपराध न्याय प्रणाली, खासतौर से आतंकवाद विरोधी अदालतें गवाहों को सुरक्षा नहीं दे पा रही हैं और सबूतों के अभाव में आतंकियों को सजा नहीं हो पाती और वे आजाद घूमते हैं। यह नवाज शरीफ की नाकामी है कि पिछले दो वर्षों के दौरान उन्होंने कुछ नहीं किया। यहां तक कि खुद न्यायपालिका ने मामलों के जल्द निपटारे के लिए एक मजबूत अपराध न्याय प्रणाली की स्थापना के लिए कुछ नहीं किया। जबकि पिछले दो वर्षों के दौरान मिलिट्री कोर्ट्स ने 274 आतंकवादियों को दोषी करार देकर सजा दी। इनमें से 161 को मौत की सजा सुनाई गई थी, जिनमें से 12 को फांसी पर लटाकाया भी जा चुका है।  113 लोगों को उम्रकैद की सजा दी गई।

मिलिट्री कोर्ट्स की आलोचना की बड़ी वजह यह है कि इनमें किसी तरह की पारदर्शिता नहीं है। यूरोपीय संघ और  मानवाधिकार संगठनों ने इस बात की आलोचना की है कि एक लोकतांत्रिक सरकार ने मिलिट्री कोर्ट को मंजूरी दी है, जबकि देश में अभी कोई मार्शल लॉ लागू नहीं है।

समाज के स्वतंत्र तबके ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को यह कहते हुए निशाना बनाया है कि आखिर क्यों एक लोकतांत्रिक पार्टी जिसने दशकों तक मौत की सजा और मिलिट्री कोर्ट का विरोध किया, मगर वह नवाज शरीफ सरकार में शामिल होने को तैयार है, जिससे संसद के जरिये मिलिट्री कोर्ट की स्थापना के लिए मंजूरी ली जा सकेगी। इससे असहमति नहीं है कि आतंकवादियों से निपटने के लिए सरकार को कुछ अप्रत्याशित कदम उठाने होंगे, मगर यदि वह यह सोचती है कि मिलिट्री कोर्ट के जरिये पाकिस्तान से आतंकवाद का खात्मा किया जा सकता है, तो वह भूल कर रही है। मिलिट्री कोर्ट और मौत की सजा आतंकी हमले को नहीं रोक सकती। खासतौर से आत्मघाती हमलों को, क्योंकि ऐसे हमलों को अंजाम देने वाला आतंकी तो पहले ही ऊंची कीमत पर अपनी जान बेच चुका होता है।


पाकिस्तान से आतंकवाद के खात्मे के लिए सार्थक और यथार्थवादी कदम उठाने की जरूरत है। इसकी शुरुआत पंजाबी जेहादियों और उनके संगठनों को खत्म कर हो सकती है, सिर्फ कुछ कुख्यात चेहरों को नजरबंद किया जाना इसका जवाब नहीं है। देशभर में फैली उनकी जड़ों को हमेशा के लिए काटने की जरूरत है।

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