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नए तलाक कानून से बदल सकते हैं रिश्ते
सुधांशु रंजन
Updated Tue, 30 Jul 2013 08:19 PM IST
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महिला सशक्तीकरण के लिए पिछले कुछ दशकों में कई कानून बनाए गए हैं। पहला क्रांतिकरी कदम 1955-56 में उठाया गया, जब हिंदू विवाह अधिनियम में महिला को पुरुष के समकक्ष रखा गया और पैतृक संपत्ति में भी उसे थोड़ा हक दिया गया। फिर 1980 के दशक से और कई कानून बनाए गए।
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अब केंद्र सरकार ने तलाक को सरल बनाने एवं स्त्रियों को पतियों की जायदाद में हक दिलाने के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 तथा विशेष विवाह अधिनियम, 1955 में संशोधन करने का निर्णय किया है। चार अगस्त, 2010 को तत्कालीन विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने विवाह अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2010 लोकसभा में पेश किया था। विधेयक को कार्मिक, जन शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति को सौंप दिया गया, जिसने अपनी अनुशंसा दे दी है। सरकार के मंत्री समूह ने उसे स्वीकार भी कर लिया है। संभावना है कि संसद के मानसून सत्र में इसे पेश किया जाएगा।
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प्रस्तावित संशोधनों में एक प्रमुख प्रावधान यह है कि पति या पत्नी कोई भी इस आधार पर तलाक की अर्जी दे सकता है कि उसकी शादी अंतिम रूप से टूट गई है। इसके लिए दोनों को याचिका दायर करने से पहले कम से कम तीन वर्षों तक अलग-अलग रहना पड़ेगा।
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पत्नी को अधिकार दिया गया है कि वह इस आधार पर तलाक का विरोध कर सकती है कि शादी खत्म होने से उसे आर्थिक संकट हो सकता है। अदालत को देखना होगा कि बच्चों के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रबंध किया गया है। विधेयक में एक नया प्रवाधान जोड़ा गया है कि पत्नी को पति की पैतृक संपत्ति में भी हिस्सा दिया जाएगा और यदि उसका विभाजन संभव न हो, तो उसमें पति के हिस्से का मूल्यांकन कर उसे भरपूर मुआवजा दिया जाएगा।
इस प्रावधान का विरोध भी शुरू हो गया है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भी पहले इसका विरोध किया था, हालांकि बाद में उसने अपना पक्ष बदल दिया। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि ऐसा हक देने से तलाक के मामले बढ़ेंगे, जिससे भारतीय परिवार व्यवस्था के परंपरागत मूल्य प्रभावित होंगे।
कई प्रतिष्ठित महिलाओं ने भी इसे आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला बताया है। उनका मत है कि जोर आर्थिक आत्म-निर्भरता पर होना चाहिए। दूसरा पक्ष यह है कि पत्नी के सहयोग से ही पति धन कमा पाता है। वह घर संभालती है, इसलिए पति बाहर निकल कर स्वच्छंद भाव से काम कर पाता है। परंतु इस कमाई में पत्नी के योगदान को अक्सर नजरंदाज किया जाता है।
यह तर्क अकाट्य है। परंतु यह लागू होता है पति द्वारा अर्जित संपत्ति पर। उसकी पैतृक संपत्ति में पत्नी का योगदान भला कहां से हो गया?
महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए पिता की संपत्ति में पहले ही उन्हें भाई के बराबर अधिकार दिया जा चुका है। हालांकि इससे भी काफी विवाद बढ़ा है। एक सच्चाई जरूर है कि तलाक की स्थिति में अकसर पति यही दलील देता है कि उसके पास कुछ भी संपत्ति नहीं है। यदि पति असंगठित क्षेत्र में काम करता है, तो उसकी आमदनी का सही-सही पता लगाना भी मुश्किल है।
प्रस्तावित कानून का एक और विवादास्पद पहलू यह है कि जहां पत्नी आर्थिक संकट के आधार पर तलाक का विरोध कर सकती है, वहीं ऐसा अधिकार पति को नहीं दिया गया है। इसके अलावा यदि पति तलाक की याचिका दायर करता है, तो उस पर दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा आदि के कई झूठे मामले ठोंक दिए जाते हैं, जिसमें पति के अलावा उसके सारे रिश्तेदार भी जेल की सीखचों के भीतर चले जाते हैं, जिनमें उसकी मां तथा बहन भी होती हैं। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब पति पर झूठे आरोप लगाकर मुकादमा ठोंका गया।
इसका तात्पर्य यह नहीं कि स्त्रियों का शोषण नहीं होता है। शताब्दियों से उनका शोषण होता आया है और आज भी शिक्षित और अशिक्षित, दोनों तरह की महिलाएं पति के जुल्म का शिकार हो रही हैं। परंतु समाधान समस्या से भी बदतर साबित हो रहा है।
स्त्री-पुरुष का रिश्ता बड़ा सम्मोहक होता है। दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। किंतु इस सम्मोहक संबंध को केवल आर्थिक आयाम देकर कानून के जरिये सभी समस्याओं का हल ढूंढने की कोशिश की जा रही है।