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महिला हितैषी छवि का सच

Thu, 01 Nov 2018 06:29 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 01 Nov 2018 06:29 PM IST
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Reality of female friendly image
सुभाषिनी सहगल अली

सबरीमाला के दरवाजे खुलने के बाद ‘महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित रखने वालों’ की भाजपा की छवि धूमिल हो गई है। तीन तलाक (एक बार में) के खिलाफ कानून बनाकर, जिसका डंका वह देश भर में पीट चुकी है, भाजपा ने अपनी यह छवि बनाई। जिस कानून को उसने जबरन लोकसभा में अपनी बहुमत के चलते पारित करवाया था, उसकी तमाम खामियों का एहसास उसे हुआ। इसीलिए अध्यादेश लाते समय उसने कुछ संशोधन किए। अध्यादेश लाना भी उचित नहीं था, क्योंकि संसद का शीतकालीन सत्र सिर्फ दो महीने बाद होने वाला था। भाजपा का मकसद महिलाओं को न्याय दिलाना नहीं था, बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण की लकीरों को और गहरा बनाने का ही था। इसीलिए संशोधन करने के बाद भी अध्यादेश में वह कमी बनी रही, जो कानून के पेश किए गए मसविदे में थी : यानी दीवानी के मामले को फौजदारी में परिवर्तित करना।


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इस कानून की कोई जरूरत ही नहीं थी। तीन तलाक के खिलाफ तो स्वयं बहुत ही बहादुर मुस्लिम महिलाएं सर्वोच्च न्यायालय तक गई थीं। न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि इस तरह का तलाक अनुचित और गैरकानूनी है। लड़ी तो वे महिलाएं थी, पर लड्डू खाने शासक दल के नेता दौड़ पड़े। बहुत कम लोगों ने उन बहादुर मुस्लिम महिलाओं को दाद दी, जो सर्वोच्च न्यायलय तक न्याय की गुहार लगाने गई थीं। और उससे भी कम लोगों ने जानने की कोशिश की कि आखिर उन महिलाओं का हुआ क्या।

ऐसी महिलाओं को मदद की बहुत जरूरत होती है। अगर वह कम पढ़ी-लिखी और गरीब होती है, तो कहीं लुप्त हो जाती है। अगर वह पढ़ी-लिखी और अपनी बात कहने वाली होती है, तो बदचलन और धर्मद्रोही कहलाती है। इन महिलाओं के प्रति सरकारों का रवैया भी अक्सर उदासीनता या विरोध का होता है। हालांकि कुछ अपवाद भी होते हैं। केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने हदिया को पूरी सुरक्षा प्रदान की थी। उसको तारीखों में सर्वोच्च न्यायालय तक सुरक्षित लाने और फिर वहां से ले जाने की पूरी जिम्मेदारी उसने निभाई। जब सुप्रीम कोर्ट ने उसे अपने मां-बाप के घर से अलग कर तमिलनाडु के एक होस्टल में रहने को कहा, तो सरकार ने उसका खर्चा उठाया और उसकी सुरक्षा का भी इंतजाम किया।

तीन तलाक के खिलाफ लड़ने वाली महिलाओं में बरेली की निदा खान भी हैं। पति ने उनको तलाक दिया, उससे मारपीट भी की। निदा का गर्भ भी गिर गया। वह मजबूरी में अपने मां-बाप के घर आ गई। वह पुलिस और न्यायालय की शरण में भी गई। लड़ते-लड़ते उसे तीन साल हो गए हैं। दिल्ली और लखनऊ, दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं, पर निदा को इंसाफ नहीं मिला है। उल्टे ससुराल वालों ने उसके और उसके परिवार के खिलाफ फतवे जारी कर दिए हैं-उसका कोई इलाज नहीं करेगा, उसके जनाजे की नमाज नहीं पढ़ी जाएगी, आदि। किसी ने तो जबर्दस्ती उसके बाल काट देने पर इनाम भी घोषित किया है। अल्पसंख्यक आयोग ने फतवा देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है, पर कार्रवाई हुई नहीं। निदा को भाजपा सरकार से उम्मीद थी कि वह उसे न्याय दिलाने की पूरी मदद करेगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।  उल्टे, उसे महत्वाकांक्षी साबित करने के लिए कहा गया कि वह भाजपा में शामिल होने जा रही है। उसे तो अपने और अन्य पीड़ित महिलाओं के मुकदमे लड़ने से फुर्सत ही नहीं है।
  
ऐसा नहीं है कि भाजपा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को बचा रही है और सबरीमाला में उनके अधिकारों पर कुठाराघात कर रही है। भाजपा चाहे कुछ भी कहे, सच यह है कि वह पुरुष प्रधानता को बचाए रखने में ही जुटी हुई है।

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