असली अध्यक्ष राहुल ही रहेंगे : अपनी पार्टी को भी उन्होंने नहीं बख्शा
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रूठे हुए राहुल गांधी को मनाने पहले कांग्रेस के मुख्यमंत्रीगण दिल्ली आए। फिर एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने राहुल के घर के सामने आत्महत्या करने की कोशिश की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कई दिनों तक मिन्नतें करते रहे कि उनको अपना इस्तीफा वापस लेना ही पड़ेगा। लेकिन राहुल अडिग रहे और पिछले सप्ताह ट्विटर पर चार पन्नों का अपना त्यागपत्र डाल दिया। इस पत्र की शुरुआत में राहुल गांधी ने चुनाव में विफलता की जिम्मेदारी स्वीकारी है। इसको पढ़कर उनके चहेतों ने टीवी चैनलों पर फौरन उनको महान कहना शुरू कर दिया।
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रूठे हुए राहुल गांधी को मनाने पहले कांग्रेस के मुख्यमंत्रीगण दिल्ली आए। फिर एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने राहुल के घर के सामने आत्महत्या करने की कोशिश की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कई दिनों तक मिन्नतें करते रहे कि उनको अपना इस्तीफा वापस लेना ही पड़ेगा। लेकिन राहुल अडिग रहे और पिछले सप्ताह ट्विटर पर चार पन्नों का अपना त्यागपत्र डाल दिया। इस पत्र की शुरुआत में राहुल गांधी ने चुनाव में विफलता की जिम्मेदारी स्वीकारी है। इसको पढ़कर उनके चहेतों ने टीवी चैनलों पर फौरन उनको महान कहना शुरू कर दिया।
अगर वे पूरा पत्र पढ़ते, तो शायद उन्हें यह भी दिखता कि राहुल ने कांग्रेस की हार का असली कारण कुछ और ही बताया है। चुनाव आयोग समेत हर लोकतांत्रिक संस्था पर उन्होंने कांग्रेस की हार का दोष डाला है। अपनी पार्टी को भी उन्होंने नहीं बख्शा है। उन्होंने लिखा है कि कई दफा उनको ऐसा लगा कि यह लड़ाई वह अकेले लड़ रहे थे। अच्छा हुआ कि इस्तीफा देने के बाद अपनी माताजी के साथ गर्मी की छुट्टी मनाने वह विदेश चले गए हैं। कांग्रेस की समस्या यह है कि दो दशकों से राजनीतिक दल न रहकर वह एक निजी कंपनी गांधी परिवार लिमिटेड बनकर रह गई है। इसकी शुरुआत इंदिरा गांधी ने संजय गांधी के हवाले कांग्रेस को करके की थी।
जब इंदिरा जी की बहु का दौर आया, तो उन्होंने अपने दोनों बच्चों को राजनीति में धकेलकर इस परंपरा को सलामत रखा। खुद सोनिया गांधी पूरे दो दशक तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं। उनकी मर्जी से प्रधानमंत्री बनते रहे हैं, उनकी मर्जी से वे सरकारें हटाई गईं, जो कांग्रस के समर्थन पर निर्भर थीं। राहुल के लिए उनकी माताजी ने तय किया कि पहले उनको कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाएगा, और इस बार अगर कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन जाती, तो राहुल या तो स्वयं प्रधानमंत्री बन जाते या अपनी मर्जी का नुमाइंदा बिठाते। देश के मतदाताओं की मर्जी कुछ और थी। जो हुआ सो हुआ।
राहुल गांधी अगर वास्तव में कांग्रेस का पुनर्जीवन चाहते हैं, तो इस्तीफा देने का तमाशा बंद करके उनको अपने आसपास ऐसे लोगों को नियुक्त करना चाहिए, जिनको इस देश के राजनीतिक परिवर्तन की समझ हो। ऐसे लोगों को ग्रामीण भारत का दर्शन करने भेजना चाहिए, ताकि इनको थोड़ी-बहुत समझ में आए कि कांग्रेस दूसरी बार इतनी बुरी तरह क्यों हारी है।
राहुल गांधी ने जिन लोगों को अपना सलाहकार बना रखा है, उनमें से एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखता, जिसको इस देश की राजनीति की समझ हो। सब दरबारी हैं, जिनकी राजनीति गांधी परिवार के दरबार तक सीमित है। सो आज भी ये लोग कहते फिर रहे हैं कि मोदी इसलिए जीते हैं, क्योंकि वह झूठ बोलने में माहिर हैं और अपना प्रचार करने में उस्ताद।
यानी देश के नादान मतदाता उनकी झूठी बातों पर फिर से धोखा खा गए हैं। वे ईवीएम पर भी दोष डालते हैं, जबकि कोई जादूगर भी ईवीएम में गड़बड़ करके इतने बड़े पैमाने पर चुनाव का रुख नहीं बदल सकता। राहुल गांधी का इस्तीफा देना इसलिए बेमतलब है, क्योंकि असली कांग्रेस अध्यक्ष वही रहेंगे। मिर्जा गालिब के शब्दों को थोड़ा-सा बदल कर कहें, तो ‘इक तमाशा हुआ, इस्तीफा न हुआ।'