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आरोप-प्रत्यारोप की धुंध में राफेल

Mon, 08 Oct 2018 06:07 PM IST
अरुणेंद्र नाथ वर्मा
अरुणेंद्र नाथ वर्मा Updated Mon, 08 Oct 2018 06:07 PM IST
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Raphael in the blur of accusations
अरुणेंद्र नाथ वर्मा
मीडिया चैनलों और जनसभाओं में चल रहे आक्षेपों और प्रतिवादों की धुंध में देश की सुरक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण राफेल विमान सौदा भटकता हुआ लग रहा है। इससे देश की जनता भ्रमित है। वायुसेना लड़ाकू विमानों की जरूरतों के मद्देनजर लंबे समय से सरकार से आग्रह कर रही थी कि उसे आधुनिकतम बहुद्देश्यीय लड़ाकू विमान उपलब्ध कराया जाए। इसी को देखते हुए यूपीए सरकार ने 2007 में 126 विमानों की खरीद प्रक्रिया शुरू की, पर 2014 तक उसे अंतिम रूप नहीं दे सकी।

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2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने फ्रांस दौरे में राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ संयुक्त घोषणा करते हुए बताया कि दसॉल्ट कंपनी से भारत 36 राफेल विमान खरीदेगा, जिसकी कीमत प्रति विमान 1,670 करोड़ रुपये होगी। यह सौदा भारत एवं फ्रांस की सरकार के बीच हुआ, पर भारतीय सहयोगी कंपनी खोजने का निर्णय दसॉल्ट पर छोड़ दिया गया, जिसने अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को चुना। 

इसमें विपक्ष को कुछ मुद्दों पर आपत्ति है। पहला मुद्दा है, विमान की कीमत, जो तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी द्वारा तय की गई कीमत से तीन गुना ज्यादा है। मोदी सरकार के अनुसार, यूपीए ने केवल विमान की कीमत तय की थी, जबकि ताजा सौदे में तमाम मारक शस्त्र प्रणाली, एवियोनिक्स से सुसज्जित विमान का मूल्य तय हुआ है। विपक्ष उन आयुधों, एवियोनिक्स संयंत्र और सुविधाओं के बारे में सूचना सार्वजनिक करने की मांग करता है, जो देश की सुरक्षा के हित में नहीं होगा। सरकार यह भी कहती है कि फ्रांस के साथ हुए करार का अनिवार्य हिस्सा है गोपनीयता।

विपक्ष ने दसॉल्ट के साथ सहयोगी कंपनी के रूप में अनिल अंबानी की कंपनी के चुनाव को भी मुद्दा बना लिया है। विपक्ष का आरोप है कि राफेल सौदे की घोषणा से मात्र बारह दिन पहले बनी कंपनी को सहयोगी कंपनी के रूप में चुनने के बजाय विमान बनाने वाली सर्वाधिक अनुभवी कंपनी एचएएल को क्यों नहीं चुना गया। विपक्ष इसे प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार के रूप में देख रहा है, क्योंकि उन्होंने तीस हजार करोड़ रुपये का लाभ अनिल अंबानी को करवा दिया।

इन आरोपों में कितना दम है, इसे समझने के लिए फिर राफेल सौदे के इतिहास में जाना होगा। यूपीए सरकार के दौरान भी एचएएल के सहयोग की बात उठी थी, पर एचएएल कंपनी के ढीले रवैये ने बात आगे नहीं बढ़ने दी। उसने इसका भी जवाब नहीं दिया कि वह कितने साल में भारत में विमान बनाएगी। यह भी ध्यान में रखना होगा कि अनगिनत दुर्घटनाओं, पायलटों की जान जाने और विमानों के नष्ट होने को लेकर जिस मिग 21 विमान को उड़न ताबूत की संज्ञा मिली, उसका देश में निर्माण एवं रख-रखाव एचएएल ही करती आई है।

इसके अलावा सहयोगी कंपनी के रूप में किसे चुना जाए, यह फैसला दसॉल्ट को करना था। दसॉल्ट मूलतः एक व्यावसायिक कंपनी है, जो लाभ छोड़कर घाटे का सौदा करने से रही। रिलायंस डिफेंस बेशक नई कंपनी है, पर वह अंबानी समूह की कंपनी है, जिसे औद्योगिक योजनाओं को रिकॉर्ड समय में खड़ा करने का हुनर आता है। 

समय आ गया है कि प्रधानमंत्री अपनी चुप्पी तोड़ें। बोफोर्स एवं अगस्ता वेस्टलैंड सौदों की तरह इसमें रिश्वत की आवाजाही का कोई सबूत नहीं है। अगर इस विवाद के चलते वायुसेना को लड़ाकू विमानों की शीघ्र आपूर्ति नहीं हुई, तो इस खेल का पूरा मजा सीमा पार बैठे भारत के दुश्मनों को आएगा।

-सेवानिवृत्त विंग कमांडर। 
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