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आंखों का इंद्रधनुष
राजेंद्र निशेश
Updated Sun, 16 Nov 2014 07:12 PM IST
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तुम्हारी आंखों का इंद्रधनुष
अधखिला क्यों है!
एक सच का आसमान
मुट्ठी में सिमट आया है,
एक दहकता जंगल
मेरी पलकों पे उतर आया है।
तुम्हारे और मेरे सपनों की दहलीज पर
उगा जलजला क्यों है!
खामोशी के तार
सपनों ने लगाए हैं
हवाओं की खुशबू ने
सम्बोधन चुराए हैं।
स्मृतियों के आंगन में
जमघटा क्यों हैं!
तुम्हारी आंखों का इंद्रधनुष
अधखिला क्यों है!
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आहट
मेघधनुष फूलों का मौसम आ चुका है।
एक मासूम गौरेया ने
प्यारा सा एक घोंसला बनाया है
अपनी नन्ही चोंच के संग,
शायद आशा और विश्वास का
जन्म होने वाला है
नन्हे फरिश्तों के रूप में।
सुबह का नारंगी सूरज
अपनी अलसायी पलकों को खोल रहा है
और दे रहा है
ठिठौली का प्रसाद
संभावनाओं की धूप में।
प्रेम और प्रार्थना के स्वरों से गूंज रहा है
पूजा-घर,
समय सांसों में उतर आया है
वेद-मंत्रों का स्वर।
डरता हूं
कोई अनाम हादसा न कर दे
खूबसूरत फूलों को बदरंग,
अपनी रूह में उतारना चाहता हूं
इठलाती तितलियों के रंग!