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अध्यापक भर्ती से उपजे सवाल

Mon, 18 Feb 2013 11:31 PM IST
बालेश्वर त्यागी
बालेश्वर त्यागी Updated Mon, 18 Feb 2013 11:31 PM IST
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questions arising from teacher recruitment

बहुप्रतीक्षित और बहुप्रचारित प्राथमिक विद्यालयों के लिए शिक्षकों की भर्ती पर माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने रोक लगा दी है। इसी भर्ती के संबंध में उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने पहले भी निर्देश जारी किए थे। पहले विवाद एक या एक से अधिक जनपदों में आवेदन को लेकर था, अब विवाद बीएड और टीईटी को लेकर है।

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एक ओर प्रदेश में अध्यापकों की कमी को लेकर अनेक प्राथमिक विद्यालय बंद हैं या एक अध्यापक/शिक्षा मित्र के भरोसे चल रहे हैं।

दूसरी ओर 72,000 से अधिक अध्यापकों की भर्ती न्यायालय में विवाद के कारण अटक गई है। ऐसे में इस समस्या के समाधान के लिए प्रदेश सरकार को गंभीर प्रयास करने पड़ेंगे। इस विषय में यह स्पष्ट होना चाहिए कि 72,000 अध्यापको की भर्ती मनरेगा की तर्ज पर शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार देने की कोई योजना नहीं है।
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प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाने के लिए ही सरकार को प्रशिक्षित शिक्षक/शिक्षिकाओं की आवश्यकता है, जिसके लिए कानून में न्यूनतम अर्हता तय है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन विद्यालयों में अध्यापक नहीं हैं, उन स्थानों पर पढ़ाने के लिए अध्यापकों की आवश्यकता है। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार को उसी अनुरूप भर्ती की स्पष्ट और कानून सम्मत नियमावली बनाने की जरूरत है।
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अभी अध्यापकों का कैडर जिला स्तर का है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी इनकी नियुक्ति करते हैं। नाराजगी या दंडस्वरूप भी किसी अध्यापक का जनपद से बाहर स्थानांतरण नहीं किया जा सकता। लेकिन अध्यापक को यह सुविधा उपलब्ध है कि वह अपने गृह जनपद या पति/पत्नी के जनपद के लिए स्थानांतरण प्राप्त कर सकता है। इस सुविधा का उपयोग/दुरुपयोग प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को पंगु बनाए हुए है।

वर्ष-1997 में प्रथम बार प्रदेश में बीटीसी प्रशिक्षित अध्यापकों की भारी कमी को देखते हुए 27,000 विशिष्ट बीटीसी (प्रशिक्षित बीएड उत्तीर्ण में से) अध्यापकों की भर्ती प्रारंभ हुई थी। भर्ती पूर्णतः मेरिट पर की गई थी। मेरिट लिस्ट प्रदेश स्तर पर तैयार की गई थी, पर नियुक्तियां जनपद में रिक्तियों के अनुसार ही दी गई।

गृह जनपद में रिक्त न होने पर मंडल में और मंडल में भी रिक्त न होने की दशा में प्रदेश के अन्य जनपदों में रिक्तियों के सापेक्ष नियुक्ति दी गई थी। उस समय संतोष हुआ कि प्रदेश के सभी जनपदों में योग्य शिक्षकों की तैनाती कर दी गई है, लेकिन अपने राजनीतिक प्रभाव का प्रयोग कर कुछ समय में ही अध्यापक अपने गृह जनपदों में स्थानांतरण कराने में सक्षम हो गए।

जिन जनपदों में रिक्तियां अधिक थीं, वहां पूर्व की ही स्थिति बन गई। इसके बाद भी दो बार अध्यापकों की भर्ती हुई है, लेकिन प्रदेश के कई जनपद इसी कारण अध्यापकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। क्या सरकार को इस समस्या का समाधान नहीं करना चाहिए?
 
आज अध्यापक का वेतन ऐसे कई सरकारी कर्मचारियों से अधिक है, जो प्रदेश में कहीं भी स्थानांतरित किए जा सकते हैं। अध्यापक के लिए दो विकल्प होने चाहिए या तो घर के पास विद्यालय में नियुक्ति पाए या घर उस विद्यालय के पास बना ले, जहां उसे नियुक्ति मिली है।

यदि सरकार प्राथमिक शिक्षा के प्रति गंभीर है, तो अध्यापक के कैडर को ब्लॉक स्तर का बनाना चाहिए तथा ब्लॉक स्तर का अधिकारी उसका नियुक्ति अधिकारी हो। साथ ही, स्थानांतरण का विकल्प अपवाद हो। तभी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की तस्वीर बदलेगी।

आज स्थिति यह है कि एक तरफ कई जनपदों में अध्यापकों के हजारों पद रिक्त हैं। दूसरी ओर बड़ी संख्या में लखनऊ, कानपुर, आगरा, गाजियाबाद, एवं गौतमबुद्धनगर जैसे जनपदों में शहरों के आसपास के विद्यालयों में बड़ी संख्या में अध्यापक तैनात हैं। वहां बच्चों की संख्या भी कम है।


सरकार को निर्णय करना पड़ेगा कि उसकी जिम्मेदारी समस्त प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति कराकर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को ठीक करना है या शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार देकर उनको मनचाही तैनाती प्रदान करना। यदि शिक्षा व्यवस्था ठीक करनी है, तो अपनी जरूरतों के अनुरूप भर्ती व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ेगी और न्यायालय के समक्ष भी ठीक से पैरवी सुनिश्चित करनी पड़ेगी।

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