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साहित्यकारों से असहज सरकार

Fri, 27 Nov 2015 09:50 PM IST
आशुतोष चतुर्वेदी/कार्यकारी संपादक, अमर उजाला
आशुतोष चतुर्वेदी/कार्यकारी संपादक, अमर उजाला Updated Fri, 27 Nov 2015 09:50 PM IST
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protest of writers and narendra modi government
बिहार: ऊंट किस करवट बैठेगा
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बिहार चुनाव को लेकर भाजपा और महागठबंधन के अपने अपने दावे हैं। भाजपा ने हाल में संघ के सामने जो प्रस्तुति दी है, उसमें उन्होंने बिहार में पूर्ण बहुमत की बात की है। भाजपा नेता के बयानों से ये आभास होता है कि एनडीए मुश्किल में है। लेकिन पत्रकारों का आकलन दिलचस्प है। बड़ी संख्या में दिल्ली स्थित पत्रकार भाजपा को बढ़त की बात कहते हैं लेकिन बिहार का दौरा कर लौट रहे दिल्ली के पत्रकार वहाँ नीतीश -लालू की सरकार बनवा रहे हैं। कुल मिलाकर यह कि मीडिया में भारी कंफ्यूजन है कि बिहार में सरकार किस की बन रही है। बहुत दिन दूर नहीं जब दिल्ली चुनावों में पत्रकारों के आकलन को आप परख ही चुके हैं।

साहित्यकारों से असहज सरकार
ऐसा बहुत कम होता है कि साहित्यकारों, इतिहासकारों और फिल्म जगत के लोगों से सरकार की मुश्किलें खड़ी हो जाएं। लेकिन मोदी सरकार असहिष्णुता के जाल में ऐसी फंस गई है कि उससे निकलते नहीं बन रहा है। इस्तीफों ने इसमें घी का काम किया है। सबसे ज्यादा मुश्किलें साहित्यकारों ने बढ़ाई है, उन्होंने इस्तीफे की शुरुआत की, उसके बाद उसमें वैज्ञानिक और फिल्मकार भी कूद पड़े। लेकिन संघ परिवार में इस मुहिम को काउंटर करने के लिए लोगों की भारी कमी महसूस की जा रही है। फिल्मकारों में पार्टी के पास एक एग्रेसिव फेस शत्रुघ्न सिन्हा हैं, वह आजकल खुद पार्टी के पीछे लठ लिए घूम रहे हैं, अनुपम खेर और हेमामालिनी मध्यम स्वर के लोग हैं। उनसे बात बन नहीं रही। दूसरी ओर इतिहासकारों मे रोमिला थापर और इरफान हबीब के कद का कोई इतिहासकार नहीं मिल रहा जो उनके तर्कों की काट कर सके। विपक्ष ने मोदी सरकार के खिलाफ एक अच्छा खासा माहौल खड़ा कर दिया है और सरकार इसको काउंटर करने में अभी तक नाकामयाब रही है।
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नतीजों पर निगाहें
बिहार के नतीजों पर वैसे तो सभी की निगाहें हैं, लेकिन भाजपा में भी पार्टी नेता बिहार के नतीजों पर तिरछी नजर रखे हुए हैं। यदि बिहार के नतीजे भाजपा के अनुकूल नहीं आए तो माना जा रहा है, सरकार में बदलाव होंगे और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर भी लोग सवाल उठाने से नहीं चूकेंगे। वैसे भी ऐसी खबरें हैं कि गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है, साथ ही वे हार्दिक पटेल को सही तरीके से हैंडिल नहीं कर पा रहीं। ऐसे में पार्टी में एक धड़े का मानना है कि अमित शाह ही इससे पार्टी को उबार सकते हैं। राजनीति में यह कहा जाने लगे कि बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और उन्हें एक और मौका दिया जाना चाहिए तो मान लीजिए कि इसका आशय यह है कि इन्हें मौका नहीं मिलना चाहिए। जैसे भाजपा में वरिष्ठ नेताओं का मार्गदर्शन मंडल है और माना जाता है कि मार्गदर्शक मंडल के नेताओं से कतई मार्गदर्शन नहीं लेना है।
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