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तराजू पर प्रेम
कविता भारत
Updated Sat, 13 Sep 2014 08:33 PM IST
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काले-भूरे-चमकीले दिखते
लोहे या पीतल के बने
कभी वैकल्पिक ईंटों या पत्थरों के भी
निर्मल ठोस
अलग-अलग नाप-तोल के लिए
प्रयुक्त होने वाले बाट
तराजू के एक पलड़े में रखे जाते वे
तो दूसरे में कूतने योग्य वस्तु
क्या तोले जा सकते हैं इन बाटों से
हमारे विचार
हमारी भावनाओं का वजन
हमारे सपने, विश्वास और नफरतों के अंश
तब सहज होता जानना-समझना
दूसरों के साथ खुद को भी
जताया नहीं जाता तब प्यार
बैठाना होता तुला पर उसको
नफरत नहीं घुलती शिराओं में
माप-तोल में थाह ले ली जाती
कि कौन कितनी कम
या ज्यादा मात्रा में घृणा करता है हमसे
बाट हमारे सुख-दुख की भी पकड़ रखते
प्रेम और दूसरे की फिक्र भी जद में होते इसकी
भान होता तब हमें
कि मेरे इतनेे किलोग्राम भी न्यून अथवा अधिक हैं
तुम्हारे इतने सेंटीग्राम अहसान के बदले
मैंने ग्राम में चुकता किया है
तब हम पक्के व्यापारी होते
छद्म नहीं असली होते
फिर चाहे जो होता या न भी होता
पर इतना तय है
कि दूध का दूध और पानी का पानी सामने पाते
नाप-तोल कर खर्च की गई भावनाएं
और जमा-बाकी का हिसाब लगा पाते
तब हम बाटों के नगर में
फूंक-फूंक कर कदम रखते
अनावृत होने के भय से।