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सत्ता संघर्ष और बढ़ेगा आप में
विनोद अग्निहोत्री
Updated Mon, 09 Mar 2015 07:40 PM IST
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आंदोलन के राजनीति में बदलने के बाद सत्ता संघर्ष स्वाभाविक है। जेपी आंदोलन के बाद बनी जनता पार्टी, भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से बने जनता दल और असम आंदोलन के गर्भ से निकली असम गण परिषद का हश्र हम देख चुके हैं। आम आदमी पार्टी का कथित वैचारिक द्वंद्व नेतृत्व में सत्ता संघर्ष का ही विस्फोट है, जिसकी वजह से पार्टी के दो संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से बाहर हो गए।
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इसके बीज 2013 के दिल्ली चुनाव में आप की सफलता से ही पड़ गए थे। पहले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, कुमार विश्वास आदि ने नेता मान लिया, पर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और शाजिया इल्मी इसे कुबूल नहीं कर सके। विधानसभा चुनाव में सफलता इतनी बड़ी थी, जिसे थामना आप नेताओं के लिए असंभव था। विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी के पास उम्मीदवारों का टोटा था, लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उसमें लाइन लग गई। इसने पार्टी को लोकसभा चुनाव में 400 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने, वाराणसी में केजरीवाल को मोदी के खिलाफ और अमेठी में कुमार विश्वास को राहुल गांधी के खिलाफ लड़ने जैसे फैसले करवा दिए। पर लोकसभा चुनाव में हार ने पार्टी में घमासान मचा दिया। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी ने केजरीवाल और उनकी टीम को निशाने पर लिया, तो केजरीवाल के विश्वस्त मनीष सिसोदिया ने योगेंद्र की भूमिका को लेकर पत्र लिख पलटवार किया। आहत तो कुमार विश्वास भी थे, पर वह अपना विश्वास डगमगाने से बचा ले गए। शाजिया ने दल त्याग किया, तो योगेंद्र-प्रशांत ने पार्टी में कमान अपने हाथों में लेने का तानाबाना शुरू कर दिया।
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एक साल की राजनीतिक कवायद से टीम केजरीवाल की पार्टी पर पकड़ मजबूत हो गई थी। इस दौरान चुनाव की मांग, जेल, विधायकों की कथित तोड़फोड़ को लेकर आप और भाजपा के मीडिया युद्ध ने केजरीवाल को जनमानस में और स्थापित कर दिया। जबकि प्रशांत-योगेंद्र पार्टी गठन के शुरुआती दौर की खुमारी में थे। व्यक्तिपूजा बनाम सामूहिक नेतृत्व की बहस चलाकर वे केजरीवाल का कद छांटने की कोशिश में थे, पर टीम केजरीवाल ने यह चुनौती भांपकर पूरी ताकत दिल्ली के गली-मुहल्लों, गांवों और झुग्गी-बस्तियों में झोंक दी। संजय सिंह ने 'पांच साल केजरीवाल' का नारा दिया, और प्रचार अभियान में भी सिर्फ केजरीवाल का चेहरा आगे रख उन्हें आप का पर्याय बना दिया। योगेंद्र और प्रशांत तब चुप रहे, और बकौल टीम केजरीवाल, वे पार्टी के 20 सीटों तक सिमटने की उम्मीद लगाए रहे। पर चुनावी नतीजों ने केजरीवाल को एकछत्र नेता बना दिया।
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यह सत्ता संघर्ष तब फिर दिखा, जब शपथ लेते ही केजरीवाल ने घोषणा की कि पांच साल वह दिल्ली में काम करेंगे। वहीं अगले दिन योगेंद्र ने अन्य राज्यों में चुनाव लड़ने की बात कह दी। योगेंद्र-प्रशांत भूषण पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी के भीतर केजरीवाल के खिलाफ मुहिम चलाई। दिलीप पांडे के पत्र में इन दोनों पर चुनाव में पार्टी की हार की उम्मीद करते हुए केजरीवाल को संयोजक पद से हटाने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। योगेंद्र यादव अब भी पार्टी से वफादारी का दम भर रहे हैं, पर मयंक गांधी, अंजलि दमानिया और आशीष खेतान के बयान बता रहे हैं कि आप में सत्ता संघर्ष बढ़ेगा और उसमें नेताओं के प्रति वफादारियों का टकराव भी तय है।